विरोध की राजनीति में जनता को भूल रहे राहुल

– Purnendu Pusshpesh

राजनीति में सरकार का विरोध करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन विरोध के नाम पर जनता की परेशानियों की अनदेखी करना कहां तक उचित है? राहुल गांधी की राजनीति को देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उन्होंने हर मुद्दे पर टकराव की राह चुन ली है? अगर ऐसा है, तो यह कांग्रेस ही नहीं, पूरे विपक्ष के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

दिल्ली के व्यापारियों और उद्यमियों के संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने रामलीला मैदान में प्रस्तावित विपक्षी रैली की तारीख आगे बढ़ाने का अनुरोध किया था। वजह थी दीपावली और धनतेरस के आसपास कारोबार का महत्वपूर्ण समय। व्यापारियों को आशंका थी कि रैली से यातायात और ग्राहकों की आवाजाही प्रभावित होगी। उनकी मांग थी कि कार्यक्रम भाई दूज के बाद किया जाए, ताकि कारोबार पर असर कम पड़े।

इस अनुरोध पर विचार करने में क्या हर्ज था? राजनीतिक रैली करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन त्योहारों के दौरान छोटे व्यापारियों की परेशानियों को समझना भी राजनीतिक जिम्मेदारी है। व्यापारी पूरे साल त्योहारों के कारोबार से अच्छी कमाई की उम्मीद रखते हैं। ऐसे में उनकी चिंता पर बातचीत करने के बजाय उसे नजरअंदाज करना संवेदनशील राजनीति का उदाहरण नहीं कहा जा सकता।

व्यापारियों की मांग पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया भी मूल मुद्दे से भटकती नजर आई। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग प्रधानमंत्री से करने की सलाह देने के बजाय उन्हें व्यापारियों की चिंता पर जवाब देना चाहिए था। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है। यदि राहुल गांधी को चुनाव प्रक्रिया पर आपत्ति है, तो उन्हें ठोस प्रमाणों के साथ कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए। केवल आरोप दोहराने से वे साबित नहीं हो जाते।

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और कथित वोट चोरी को लेकर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है। चुनाव आयोग की जवाबदेही भी जरूरी है। लेकिन आरोप और प्रमाण में अंतर होता है। लोकतंत्र में गंभीर आरोपों को तथ्यों के आधार पर साबित करना चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए।

राहुल गांधी को समझना होगा कि राजनीति केवल सरकार के विरोध से नहीं चलती। जनता यह भी देखती है कि कौन उसकी समस्याओं को समझता है और कौन अपने राजनीतिक एजेंडे को प्राथमिकता देता है। यदि हर मुद्दे पर टकराव ही उनकी राजनीति की पहचान बनता है, तो इसका नुकसान कांग्रेस के साथ-साथ दूसरे विपक्षी दलों को भी उठाना पड़ सकता है।

यह कहना जल्दबाजी होगी कि किसी एक फैसले से पूरा व्यापारिक समुदाय राहुल गांधी का विरोधी हो जाएगा। लेकिन व्यापारियों की जायज चिंता की अनदेखी उनके प्रति नाराजगी जरूर बढ़ा सकती है। आखिर छोटे व्यापारियों को भी राजनीतिक दलों से सहयोग और समझदारी की उम्मीद होती है।

राहुल गांधी को तय करना होगा कि उनकी राजनीति का उद्देश्य केवल भाजपा का विरोध करना है या जनता का विश्वास जीतना भी। सरकार का विरोध लोकतंत्र की जरूरत है, लेकिन विरोध के चक्कर में जनता के हित पीछे छूट जाएं, तो राजनीति मजबूत नहीं, कमजोर होती है।