– PURNENDU PUSSHPESH
चुनाव की आहट के साथ नेताओं के पाला बदलने का खेल तेज होने लगता है। कल तक जिस पार्टी और विचारधारा के नाम पर जनता से वोट मांग रहे थे, आज उसी को छोड़कर दूसरी पार्टी का झंडा उठा लेते हैं। अपने फैसले को सही ठहराने के लिए जनहित, विकास और देशहित की दलीलें भी देते हैं। सवाल है कि अगर विचारधारा और जनता की सेवा ही राजनीति का आधार है, तो चुनाव जीतने के बाद नेताओं के विचार अचानक कैसे बदल जाते हैं? क्या यह वैचारिक बदलाव है या राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने की कोशिश?
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की सितंबर 2026 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, 2022 से जुलाई 2026 के बीच चुनाव जीतने के बाद 111 सांसदों और विधायकों ने अपनी पार्टी बदल ली। इनमें लोकसभा के 26 सांसद, राज्यसभा के सात सदस्य और 78 विधायक शामिल हैं। नागालैंड में ऐसे 32 और पश्चिम बंगाल में 20 मामले सामने आए। ये आंकड़े बताते हैं कि दलबदल अब अपवाद नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की गंभीर समस्या बन चुका है।
किसी उम्मीदवार को वोट देते समय मतदाता केवल उसका चेहरा नहीं देखता। वह पार्टी, उसकी विचारधारा और चुनावी वादों को भी ध्यान में रखता है। ऐसे में चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलना केवल नेता का निजी फैसला नहीं रह जाता, बल्कि उन मतदाताओं के भरोसे पर भी चोट करता है, जिन्होंने उसे एक खास राजनीतिक पहचान के आधार पर चुना था। नेता अपना रास्ता बदलकर राजनीतिक भविष्य सुरक्षित कर लेता है, लेकिन मतदाता के पास अपने फैसले पर सवाल उठाने के अलावा क्या बचता है?
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना का विभाजन और अजित पवार के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में टूट इसके बड़े उदाहरण हैं। दोनों घटनाओं ने राज्य की सत्ता का समीकरण बदल दिया। गोवा में कांग्रेस के आठ विधायकों का भाजपा में जाना भी इसी प्रवृत्ति को दिखाता है। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि दलबदल किसी एक पार्टी की समस्या नहीं है। सत्ता की संभावना और राजनीतिक लाभ के लिए लगभग सभी दल कभी न कभी इस प्रवृत्ति का हिस्सा बने हैं।
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 से जुलाई 2026 के बीच 29 सांसद और विधायक दूसरी पार्टियां छोड़कर भाजपा में शामिल हुए। इस अवधि में भाजपा ऐसे प्रतिनिधियों को अपने साथ जोड़ने वाली पार्टियों में दूसरे स्थान पर रही, जबकि नागा पीपुल्स फ्रंट में 32 प्रतिनिधि शामिल हुए। ये आंकड़े बताते हैं कि दलबदल का लाभ केवल किसी एक दल को नहीं मिलता। राजनीतिक दल भी चुनावी फायदे के लिए दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ने से परहेज नहीं करते।
यहां एक दिलचस्प सवाल है। कोई नेता विपक्षी दल छोड़कर सत्ताधारी भाजपा में जाता है, तो कम से कम उसके राजनीतिक लाभ का गणित समझ में आता है। उसे सत्ता में भागीदारी, अपने क्षेत्र में काम कराने या राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने की उम्मीद हो सकती है। इससे उसका फैसला सही नहीं हो जाता, लेकिन उसकी मंशा समझने का एक आधार मिलता है। इसके विपरीत, एक विपक्षी दल छोड़कर दूसरे विपक्षी दल में जाने वाले नेता से यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि आखिर उसने अपना रास्ता क्यों बदला? क्या पुरानी पार्टी की विचारधारा गलत हो गई या वहां उसका राजनीतिक भविष्य सुरक्षित नहीं रह गया? हालांकि किसी नेता की नीयत का फैसला केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वह किस दल में गया है। उसके फैसले के कारण और जनता के प्रति उसकी जवाबदेही भी देखनी होगी।
दलबदल को बढ़ावा देने में उन राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है, जो दूसरे दलों से आए नेताओं को तुरंत टिकट और पद देने लगते हैं। इससे वर्षों तक पार्टी के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है। वे सवाल करते हैं कि अगर चुनाव जीतने की क्षमता ही सबसे बड़ा पैमाना है, तो विचारधारा, संगठन के प्रति निष्ठा और लंबे समय तक किए गए संघर्ष का महत्व क्या रह गया? राजनीतिक दल जब तक तात्कालिक लाभ के लिए दलबदल करने वालों को पुरस्कृत करते रहेंगे, तब तक इस प्रवृत्ति पर रोक लगाना मुश्किल होगा।
समाधान के लिए दलबदल से जुड़े मामलों में समयबद्ध निर्णय और कानून का निष्पक्ष पालन जरूरी है। लेकिन कानूनी कार्रवाई के साथ राजनीतिक दलों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। नेता को पार्टी बदलने का अधिकार हो सकता है, मगर उसे अपने फैसले का कारण जनता को बताना चाहिए।
लोकतंत्र में जनता प्रतिनिधि चुनती है, उसे अपने राजनीतिक फायदे के लिए जनता के भरोसे से खिलवाड़ करने का अधिकार नहीं देती। विचारों में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन अवसर देखकर बार-बार पाला बदलना राजनीतिक ईमानदारी पर सवाल खड़ा करता है। दलबदल करने वाला नेता केवल अपना राजनीतिक करियर नहीं बदलता, वह उन मतदाताओं के भरोसे को भी तोड़ता है, जिन्होंने उसे अपना प्रतिनिधि चुना था।

