अधिकार चेतना के साथ कर्तव्यबोध भी जरूरी

= Purnendu Pusshpesh

नई पीढ़ी के सामने आज जानकारी की कमी नहीं, बल्कि उपलब्ध जानकारी को समझने, परखने और उसका सही इस्तेमाल करने की चुनौती है। मोबाइल, इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने सीखने के तौर-तरीके बदल दिए हैं। अब बच्चों की सोच केवल परिवार, विद्यालय और समाज से प्रभावित नहीं होती, बल्कि डिजिटल दुनिया भी उनके विचार और व्यवहार को आकार देती है। ऐसे में शिक्षा की जिम्मेदारी पाठ्यक्रम पूरा कराने और परीक्षा में अच्छे अंक दिलाने तक सीमित नहीं रह सकती। उसे नई पीढ़ी में विवेक, सामाजिक चेतना और जिम्मेदारी का बोध भी विकसित करना होगा।

आज के युवा अपने अधिकारों को लेकर पहले से अधिक सजग हैं। वे सवाल करते हैं, अपनी राय रखते हैं और स्वतंत्र निर्णय लेना चाहते हैं। इसे पीढ़ी की कमजोरी मानने के बजाय लोकतांत्रिक चेतना के विकास के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन अधिकारों के प्रति जागरूकता तभी सार्थक है, जब उसके साथ कर्तव्यों की समझ भी विकसित हो। दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा और सामाजिक संवाद में अधिकारों की चर्चा जितनी प्रमुखता से होती है, कर्तव्यों पर उतना जोर दिखाई नहीं देता। यह असंतुलन दूर करना जरूरी है।

लोकतंत्र का आधार केवल अधिकारों की उपलब्धता नहीं, बल्कि उनका जिम्मेदार इस्तेमाल भी है। अपनी बात कहने की स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब व्यक्ति दूसरों को भी अपनी बात रखने का अवसर दे। समानता की मांग करने वाले को अपने व्यवहार में भी भेदभाव से बचना होगा। कानून से अपने अधिकारों की रक्षा की अपेक्षा करने वाले नागरिक का दायित्व है कि वह स्वयं भी कानून का सम्मान करे। अधिकारों को केवल व्यक्तिगत हित तक सीमित कर देने से सामाजिक टकराव बढ़ सकता है। उनका वास्तविक महत्व तभी है, जब वे सामूहिक हित और न्याय की भावना को मजबूत करें।

इस दिशा में परिवार और विद्यालय की भूमिका निर्णायक है। बच्चों में जिम्मेदारी का भाव केवल भाषणों और नैतिक शिक्षा की पुस्तकों से पैदा नहीं होगा। इसके लिए जरूरी है कि वे अपने आसपास जिम्मेदार आचरण देखें। घर और विद्यालय में संवाद की स्वतंत्रता हो, सवाल पूछने को प्रोत्साहित किया जाए और असहमति को अनुशासनहीनता न माना जाए। साथ ही, बच्चों को यह भी समझाया जाए कि स्वतंत्रता का अर्थ मनमानी नहीं और अनुशासन का अर्थ सवाल करने पर रोक लगाना नहीं है। संस्कारों का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को विवेकशील बनाना होना चाहिए, न कि उसे बिना सोचे किसी बात को स्वीकार करने की आदत डालना।

डिजिटल माध्यमों ने इस विषय को और गंभीर बना दिया है। सोशल मीडिया पर किसी सूचना का तेजी से प्रसारित होना उसकी सत्यता का प्रमाण नहीं है। इसके बावजूद बिना पुष्टि किए संदेश साझा करना, असहमति पर अपमानजनक टिप्पणी करना और निजी जानकारी सार्वजनिक करना आम होता जा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से मिलने वाली जानकारी भी त्रुटिहीन नहीं होती। इसलिए डिजिटल शिक्षा का अर्थ केवल तकनीक चलाना सिखाना नहीं, बल्कि उसके जिम्मेदार उपयोग की समझ विकसित करना भी है। नई पीढ़ी को सूचना के स्रोत की जांच, तथ्यों का सत्यापन और ऑनलाइन व्यवहार के सामाजिक प्रभावों को समझना होगा।

यहीं शिक्षा में आलोचनात्मक चिंतन का महत्व सामने आता है। बच्चों को तैयार जवाब देने के बजाय उन्हें सवालों के जरिए सोचने का अवसर मिलना चाहिए। वे किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार न करें कि उसे कोई प्रभावशाली व्यक्ति कह रहा है या बड़ी संख्या में लोग उसका समर्थन कर रहे हैं। तथ्य, तर्क और विवेक के आधार पर निष्कर्ष निकालने की क्षमता ही उन्हें गलत सूचनाओं और भ्रामक प्रचार से बचा सकती है। यह क्षमता केवल परीक्षा में नहीं, बल्कि नागरिक जीवन में भी उपयोगी है।

शिक्षा की सफलता का आकलन केवल अंकों, डिग्रियों और रोजगार से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि शिक्षित व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में कितना विवेकपूर्ण निर्णय लेता है, असहमति के प्रति कितना सहिष्णु है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी कितनी समझता है। विकसित भारत का लक्ष्य भी केवल आर्थिक वृद्धि और तकनीकी प्रगति से पूरा नहीं होगा। इसके लिए ऐसे नागरिक चाहिए, जो अपने अधिकारों के प्रति सजग हों, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करें और अपने कर्तव्यों से मुंह न मोड़ें।

नई पीढ़ी को बदलती दुनिया के अनुरूप अवसर और स्वतंत्रता देना जरूरी है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी का बोध विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। अधिकारों के प्रति जागरूक नागरिक लोकतंत्र को आवाज देते हैं, जबकि कर्तव्यनिष्ठ नागरिक उसे मजबूती देते हैं। शिक्षा को इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। यही संतुलन जागरूक युवा को जिम्मेदार नागरिक और जिम्मेदार नागरिक को राष्ट्र निर्माण का सहभागी बना सकता है।