भारतीय मीडिया में दलित संपादक: जातिवाद की नई व्याख्या या बौद्धिक पतन?

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश।  अगर आप भारतीय मीडिया में दलित संपादकों की संख्या जानने का प्रयास कर रहे हैं, तो बधाई हो! आप उस जटिल…

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झारखंड में वंशवाद का नया अध्याय, समर्पित कार्यकर्ताओं का क्या होगा ?

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश।  झारखंड में इस बार विधानसभा चुनाव का नया रंग जमने वाला है, और इसकी वजह भी खास है। चुनावी मैदान में…

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माझी जो नाव डुबोए उसे कौन पार लगाए

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश।  जम्मू-कश्मीर में चुनाव की घोषणा के साथ राहुल गांधी ने एक और नई गारंटी दी है – “इंडी गठबंधन की अगली…

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कांग्रेस के भविष्य पर संकट: राहुल और प्रियंका की अनुभवहीनता का असर

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश।  भारतीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी की मौजूदा स्थिति किसी से छिपी नहीं है। कभी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी हुआ…

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संविधान और राज्य सरकारों का नया खेल: अधिकारों का बंटवारा या सर्कस?

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश।  क्या आप जानते हैं कि भारत के संविधान के साथ अब एक नया खेल खेला जा रहा है? जी हाँ, यह…

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राष्ट्रवाद और भारतीय मीडिया की जिम्मेदारी

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश।  राष्ट्रवाद का भारतीय संदर्भ एक ऐसा विषय है, जो देश की सांस्कृतिक, सामाजिक, और राजनीतिक धारा के मूल में समाहित है।…

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राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्व

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश।  राष्ट्र की एकता, शक्ति और प्रगति का मुख्य आधार है। जब देश के नागरिक एकजुट होते हैं, तो राष्ट्र भी सक्षम…

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आरक्षण: सामाजिक न्याय या राजनीतिक हथियार?

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश।  भारत में आरक्षण की अवधारणा मूल रूप से सामाजिक न्याय और समानता के उद्देश्य से की गई थी। जब देश आज़ाद…

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झारखंड का भविष्य सकारात्मक हो सकता है यदि राज्य में नेतृत्व मजबूत और दूरदर्शी हो

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश।  झारखंड के भविष्य को लेकर चिंताएं स्वाभाविक हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि राज्य का भविष्य अंधकारमय है। यदि…

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मानो न मानो, झारखण्ड में फिर से बहने लगी है हेमंती बयार

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश।  मैं अगर सच्चा हूँ तो मुझे अपने सच का प्रमाण देना ही होगा; यही आज का सच है। आप पर कोई…

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