कानून और प्रमाण के दायरे में रहे लोकतंत्रिक विरोध

– PURNENDU PUSSHPESH

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी कानून और संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान भी है। सरकार की नीतियों की आलोचना करना विपक्ष की जिम्मेदारी है, लेकिन राजनीतिक विरोध के नाम पर व्यवस्था को चुनौती देना या बिना ठोस प्रमाण संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाना उचित नहीं है। लोकतंत्र में असहमति के लिए पूरी जगह होनी चाहिए, लेकिन आरोपों की बुनियाद तथ्य और प्रमाण होने चाहिए। किसी संस्था की विश्वसनीयता पर केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर फैसला नहीं सुनाया जा सकता। लोकतंत्र की मजबूती केवल विरोध करने के अधिकार से नहीं, बल्कि उस अधिकार का जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करने से तय होती है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में कांग्रेस के प्रदर्शन ने इसी सवाल को चर्चा में ला दिया है। कांग्रेस को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का अधिकार है, लेकिन उन सवालों के पीछे ठोस आधार भी होना चाहिए। किसी संवैधानिक पदाधिकारी का इस्तीफा मांगना राजनीतिक अधिकार है, मगर केवल नारों और आरोपों से किसी संस्था की विश्वसनीयता तय नहीं हो सकती।

दिल्ली पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस के तीन नेताओं को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धाराओं 126 और 170 के तहत एहतियातन हिरासत में लिया गया था। कानूनी प्रक्रिया के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। कांग्रेस ने कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए सरकार पर आरोप लगाए। इन आरोपों का मूल्यांकन तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। बिना पूरी जानकारी के हिरासत को सरकारी दमन बताना जितना अनुचित है, उतना ही गलत किसी भी पुलिस कार्रवाई को जांच से परे मान लेना होगा।

विपक्ष का दायित्व सरकार की कमियां सामने लाना है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता इस बात से बढ़ती है कि वह अपने आरोपों को कितने ठोस तथ्यों के साथ रखता है। यदि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्ति है, तो संबंधित आंकड़े और दस्तावेज जनता के सामने आने चाहिए। संवैधानिक संस्थाओं से जवाबदेही मांगना जरूरी है, लेकिन उनकी स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका भी जांच के दायरे में रहनी चाहिए। शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का अधिकार है, जबकि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी। यदि कार्रवाई में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जांच और उचित कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई हर कार्रवाई को राजनीतिक बदले का कदम मानना भी सही नहीं है। फैसला आरोपों से नहीं, तथ्यों से होना चाहिए।

सरकार और प्रशासन को आलोचना के प्रति संवेदनशील रहना होगा। कानून का इस्तेमाल असहमति दबाने के लिए नहीं होना चाहिए और किसी व्यक्ति के राजनीतिक विचार के आधार पर उसके साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। इसी तरह, प्रदर्शनकारियों को भी अपने अधिकारों का इस्तेमाल जिम्मेदारी से करना चाहिए। किसी आंदोलन को विदेशी साजिश बताने या भीड़ जुटाने के लिए पैसे दिए जाने जैसे गंभीर आरोप भी प्रमाण के बिना नहीं लगाए जाने चाहिए।

लोकतंत्र में सरकार की मजबूती विरोध को दबाने से नहीं, बल्कि अपने काम और फैसलों से जनता का भरोसा जीतने से आती है। विपक्ष की ताकत भी केवल विरोध में नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर सवाल उठाने में है। सरकार से सवाल पूछना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आरोपों के लिए प्रमाण और विरोध के साथ कानून का सम्मान जरूरी है। यही संतुलन राजनीतिक बहस को आरोप-प्रत्यारोप से आगे ले जाकर जनता के वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित कर सकता है।