हैं प्रेम के भूखे प्रभु जी……ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

प्रभु तो प्रेम के भूखे होते हैं और प्रेम हीं ग्रहण करते हैं। राधा, मीरा, हनुमान जी, शबरी के प्रेम के वश हो कर हीं प्रभु ने सब को अपना लिया। इसी प्रसंग पर प्रस्तुत है मेरी ये रचना :——-

हैं प्रेम के भूखे प्रभु जी ,
प्रभु ने प्रेम हीं ग्रहण किया ।
प्रेम किया राधा ने किशन से ,
बनि गइ राधा कृष्णप्रिया ।
रुकमिणि कृष्ण कोइ नहिं बोले ,
राधाकृष्ण हिं नाम लिया ।
हैं प्रेम के भूखे प्रभु जी………
प्रेम किया मीरा ने किशन से ,
नाच नाच गुणगान किया ।
विष का प्याला पी गइ मीरा ,
विष भी अमृत तुल्य किया ।
हैं प्रेम के भूखे प्रभु जी………
प्रेम किए हनुमत जी ऐसो ,
धर ली सीताराम हिया ।
सीताराम की रटन लगी ,
सीना चीर दिखाइ दिया ।
हैं प्रेम के भूखे प्रभु जी………
प्रेम किया शबरी ने प्रभु से ,
निश दिन प्रभु का ध्यान किया ।
जूठे बैर खाइ कर प्रभु ने ,
प्रेम को आदर मान दिया ।
हैं प्रेम के भूखे प्रभु जी………

रचनाकार
   ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र