परब्रह्म धरी पावन नर देही .
(सवैया – प्रथम)
दशरथ कौशल्या के प्रेम के वश,
परब्रह्म धरी पावन नर देही ।
बहु बाल चरित्र करी प्रभु जी,
प्रभु मातु पिता को अती सुख देहीं ।।
जो सारे जग को खेल खेलावत,
कौशल्या के गोद में खेलत जेही ।
आँगन चलत ठुमकि ठुमकत जब,
मैयन्ह के चित को हरि लेहीं ।।
पुरजन परिजन के प्यारे दुलारे,
सबै सुख देत चलैं मन मोही ।
‘ब्रह्मेश्वर’ के उर बसहु सदा,
सोइ बालक रूप जो परम सनेही ।।
(सवैया – द्वितीय)
धेनू धरती सुर संत लगी,
परब्रह्म धरी पावन नर देही ।
बन भटकत कष्ट सहत दारुण,
सुख देत चलैं सुर संत सनेही ।।
कपि भालु सौं प्रीत पुनीत किये,
अति दुष्ट निशाचर मारहिं जेही ।
केवँट शबरी अरु गिद्ध जटायु,
कृपालु दयालु परमगति देहीं ।।
बालि बिराध कबंध सबै,
प्रभु जी निजधाम पठावहिं जेही ।
‘ब्रह्मेश्वर’ के उर बसहु सदा,
पथगामि श्रीराम लखन वैदेही ।।
रचनाकार :

ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

