प्रस्तुत है मेरी ये रचना जिसमें मैने प्रभु के चरण कमल की वन्दना की है :—–.
भजले चरन कमल रघुराई ।
जेहि चरनन से सुरसरि निकली ,
जग तारनी कहाई ।
भजले चरन कमल………..
जेहि चरनन से तरी अहिल्या ,
शिला नारि बनि जाई ।
भजले चरन कमल………..
जेहि चरनन केवँट धोइ लिन्हा,
तब हरि नाव चढ़ाई ।
भजले चरन कमल……….
जेहि चरनन की चरन पादुका ,
भरत रहे चित लाई ।
भजले चरन कमल………..
जेहि चरनन में प्रान त्याग कर ,
गिद्ध परमपद पाई ।
भजले चरन कमल………..
रचनाकार :

ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

