बड़े भाग्य से यह मानव शरीर मिलता है । इस शरीर को पा कर सुन्दर कर्म करना चाहिये तभी इस पावन शरीर को पाने की सार्थकता है । तुलसीदास जी ने लिखा है :—- परहित सरिस धरम नहिं भाई , पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।
मैने इन्हीं पंक्तियों को लेकर उपरोक्त प्रसंग पर ये रचना की है जो आप सबों की सेवा में प्रस्तुत है :——-.
परहित सरिस धरम नहिं भाई ,
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।
हरि की कृपा से जग में आया ,
सुन्दर पावन नर तन पाया ,
कर्म करो अस जश जग छाई ।
परहित सरिस धरम…………
काम क्रोध मद लोभ त्याग कर ,
स्वपन जगत से उठो जाग कर ,
भजलो राम छोड़ि कुटिलाई ।
परहित सरिस धरम…………
नहिं कुछ जग से ले जाएगा ,
कर्म हिं तेरे साथ जाएगा ,
सुन्दर कर्म करो मोरे भाई ।
परहित सरिस धरम…………