बांकीपुर उपचुनाव: एक सीट का फैसला, पूरे बिहार का जनादेश नहीं

पूर्णेन्दु पुष्पेश :

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के परिणाम सामने आने के बाद इसे लेकर राजनीतिक निष्कर्षों का दौर शुरू हो गया है। किसी एक विधानसभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव के परिणाम को पूरे राज्य की राजनीतिक दिशा, किसी दल के घटते-बढ़ते जनाधार या आगामी विधानसभा चुनाव की संभावित तस्वीर से जोड़कर देखना स्वाभाविक राजनीतिक प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन इसे अंतिम निष्कर्ष मान लेना तार्किक नहीं होगा। चुनावी राजनीति में हर चुनाव का अपना संदर्भ, अपना मतदाता समूह, अपनी परिस्थितियां और अपना स्थानीय समीकरण होता है। इसलिए बांकीपुर के परिणाम का सबसे उचित विश्लेषण यही है कि इसे पहले एक विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं के फैसले के रूप में समझा जाए और उसके बाद ही इससे निकलने वाले व्यापक संकेतों पर विचार किया जाए।

उपचुनाव और आम विधानसभा चुनाव के चरित्र में बुनियादी अंतर होता है। विधानसभा चुनाव में मतदाता के सामने सरकार बनाने का व्यापक विकल्प होता है। राज्य के विकास, मुख्यमंत्री का चेहरा, कानून-व्यवस्था, रोजगार, महंगाई, कल्याणकारी योजनाएं और शासन का प्रदर्शन जैसे मुद्दे एक साथ प्रभाव डालते हैं। इसके विपरीत उपचुनाव प्रायः किसी रिक्त सीट को भरने के लिए होता है। उसमें स्थानीय उम्मीदवार, व्यक्तिगत संपर्क, जातीय और सामाजिक समीकरण, स्थानीय नाराजगी, संगठन की सक्रियता और किसी विशेष मुद्दे की भूमिका कहीं अधिक प्रभावशाली हो सकती है। इसलिए बांकीपुर के परिणाम को पूरे बिहार के मतदाताओं के सामूहिक राजनीतिक मनोभाव का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी।

भारतीय चुनावी इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जो इस सावधानी की पुष्टि करते हैं। वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनाव में भाजपा को हार मिली थी। गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक आधार माना जाता था, जबकि फूलपुर से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सांसद रह चुके थे। इन दोनों सीटों पर हार निश्चित रूप से भाजपा के लिए राजनीतिक झटका थी, लेकिन अगले ही वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन किया। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने राज्य में सत्ता बरकरार रखी। इससे स्पष्ट होता है कि उपचुनाव की हार को तत्काल भविष्य के व्यापक चुनावी परिदृश्य का निश्चित संकेत मानना उचित नहीं है।

महाराष्ट्र का कस्बा पेठ विधानसभा उपचुनाव भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण उदाहरण है। वर्ष 2023 में भाजपा को इस परंपरागत रूप से मजबूत सीट पर कांग्रेस के रविंद्र धंगेकर से हार का सामना करना पड़ा। लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सीट वापस हासिल कर ली और भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने राज्य में भारी बहुमत प्राप्त किया। यानी एक सीट पर उपचुनाव का परिणाम कुछ समय बाद उसी क्षेत्र में बदल सकता है। मतदाताओं का फैसला स्थायी राजनीतिक अनुबंध नहीं होता; परिस्थितियां, मुद्दे और उम्मीदवार बदलते ही चुनावी व्यवहार भी बदल सकता है।

बांकीपुर में मतदान प्रतिशत का सवाल भी विश्लेषण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार यहां मतदान केवल 34.24 प्रतिशत रहा। इतने कम मतदान वाले चुनाव में परिणाम का विश्लेषण करते समय यह देखना जरूरी है कि किस वर्ग ने मतदान किया और किस वर्ग की अपेक्षाकृत कम भागीदारी रही। आम चुनावों में बड़ी संख्या में मतदाता मतदान करते हैं, जबकि उपचुनावों में कई बार राजनीतिक उत्साह और मतदान की प्राथमिकता कम रहती है। ऐसे में जीत का अंतर या किसी दल का प्रदर्शन पूरे विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं की समान राजनीतिक पसंद को पूरी तरह प्रतिबिंबित करता है, ऐसा मानना उचित नहीं होगा।

कम मतदान का अर्थ यह भी नहीं है कि परिणाम महत्वहीन है। बांकीपुर के मतदाताओं ने जो फैसला दिया है, उसका सम्मान होना चाहिए। विजेता उम्मीदवार और दल के लिए यह महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि है। लेकिन उस उपलब्धि का अर्थ निकालते समय यह अंतर बनाए रखना आवश्यक है कि एक सीट पर जीत और पूरे राज्य में राजनीतिक समर्थन दो अलग-अलग बातें हैं। उपचुनाव किसी दल को स्थानीय स्तर पर अपनी रणनीति, उम्मीदवार चयन और संगठन की समीक्षा का अवसर जरूर देता है, लेकिन इससे पूरे राज्य में सत्ता परिवर्तन की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

इसी तरह, चुनाव परिणाम के बाद ईवीएम को लेकर सवाल उठाना भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए। चुनावी हार के बाद ईवीएम पर सवाल और जीत के बाद उसी व्यवस्था पर विश्वास—यह दोहरा रवैया लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता के भरोसे को कमजोर कर सकता है। यदि किसी राजनीतिक दल के पास ईवीएम या चुनावी प्रक्रिया को लेकर ठोस तकनीकी या प्रक्रियागत आपत्ति है तो उसे निर्धारित संवैधानिक और कानूनी मंच पर प्रमाण के साथ उठाया जाना चाहिए। केवल चुनाव परिणाम किसी दावे का प्रमाण नहीं हो सकता। लोकतंत्र में चुनाव आयोग, मतदान प्रक्रिया और न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों की साझा जिम्मेदारी है।

बांकीपुर का परिणाम इसलिए भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों के लिए अध्ययन का विषय जरूर होना चाहिए। भाजपा को यह देखना होगा कि स्थानीय स्तर पर संगठन, उम्मीदवार और मतदाताओं के साथ संवाद में कहां कमी रही। विपक्षी दलों को भी यह समझना होगा कि किसी उपचुनाव में सफलता अपने आप राज्यव्यापी राजनीतिक विस्तार में परिवर्तित नहीं होती। वहीं जीतने वाले दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने प्रदर्शन को एक सीट की सीमा से बाहर ले जाने की होगी।

अंततः बांकीपुर उपचुनाव को न तो सामान्य चुनाव की तरह कम करके आंका जाना चाहिए और न ही इसे पूरे बिहार का राजनीतिक जनादेश घोषित कर देना चाहिए। लोकतंत्र में हर चुनाव का अपना महत्व है और हर परिणाम अपने समय तथा परिस्थितियों में महत्वपूर्ण संदेश देता है। बांकीपुर का परिणाम स्थानीय राजनीति, उम्मीदवारों, संगठन और मतदाताओं के व्यवहार को समझने के लिए उपयोगी संकेत दे सकता है, लेकिन बिहार की अगली व्यापक राजनीतिक तस्वीर का फैसला किसी एक उपचुनाव से नहीं होगा। वह फैसला तब होगा, जब राज्य के सभी विधानसभा क्षेत्रों के मतदाता व्यापक मुद्दों और भविष्य की सरकार के सवाल पर अपना जनादेश देंगे।