– Purnendu Pusshpesh
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां अलग-अलग धर्म हैं, अलग-अलग जातियां हैं, अलग-अलग भाषाएं हैं, अलग-अलग परंपराएं हैं और अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी सामाजिक पहचान है। यह विविधता भारत की ताकत है। लेकिन विविधता का मतलब यह नहीं हो सकता कि नागरिकों के मूल अधिकार भी उनकी धार्मिक या सामाजिक पहचान के हिसाब से अलग-अलग हो जाएं। यहीं से समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी की जरूरत का सवाल सामने आता है।
समान नागरिक संहिता का मूल विचार बहुत सीधा है -देश का नागरिक पहले नागरिक है, बाद में वह किसी धर्म, जाति या क्षेत्र से जुड़ा हुआ व्यक्ति है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और परिवार से जुड़े दूसरे नागरिक मामलों में कानून का आधार व्यक्ति की नागरिकता होना चाहिए, उसका धर्म नहीं। संविधान का अनुच्छेद 44 भी राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है।
इसलिए यूसीसी को केवल किसी राजनीतिक दल का मुद्दा मानकर देखना ठीक नहीं होगा। यह उससे कहीं बड़ा संवैधानिक सवाल है। सवाल यह है कि क्या एक लोकतांत्रिक देश में समान नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून होना चाहिए? जवाब तलाशते समय हमें राजनीति से ऊपर उठकर संविधान के समानता के सिद्धांत को देखना चाहिए।
हाल में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। यह एक बड़ा नीतिगत लक्ष्य है। लेकिन लक्ष्य तय करना एक बात है और उसे सामाजिक तथा संवैधानिक रूप से स्वीकार्य तरीके से लागू करना दूसरी बात। यूसीसी के मामले में दोनों जरूरी हैं।
बिहार में इस मुद्दे पर सहयोगी दलों की ओर से अधिक चर्चा और प्रावधानों को देखने की बात कही जा रही है। जेडीयू और एलजेपी जैसे दलों ने अलग-अलग स्तर पर संबंधित पक्षों से बातचीत की आवश्यकता जताई है। इसे केवल राजनीतिक खींचतान के रूप में नहीं देखना चाहिए। कानून बनने से पहले सवाल पूछना, प्रावधानों को समझना और उनके संभावित प्रभावों पर चर्चा करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
लेकिन बातचीत का अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि समानता का सिद्धांत ही टाल दिया जाए। अगर किसी कानून में कोई ऐसी व्यवस्था है जो महिला और पुरुष के अधिकारों में अनावश्यक अंतर पैदा करती है, या समान परिस्थिति में अलग-अलग नागरिकों को अलग कानूनी अधिकार देती है, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। धर्म किसी व्यक्ति की आस्था हो सकता है, लेकिन नागरिक अधिकारों का आधार क्या होना चाहिए, इस पर देश को गंभीरता से विचार करना ही होगा।
यहां एक और बात समझने की जरूरत है। समान नागरिक संहिता का अर्थ यह नहीं कि भारत की सारी सांस्कृतिक विविधता समाप्त कर दी जाए। कानून समान हो सकता है, लेकिन स्थानीय संस्कृति, परंपरा और जनजातीय पहचान से जुड़े संवेदनशील विषयों को समझकर प्रावधान बनाए जा सकते हैं। मौजूदा यूसीसी मॉडल पर भी जनजातीय समुदायों और उनकी विशिष्ट परंपराओं को लेकर अलग प्रावधानों की चर्चा हुई है। इसलिए असली बहस ‘यूसीसी चाहिए या नहीं’ से आगे बढ़कर ‘यूसीसी कैसा हो’ पर होनी चाहिए।
भारत में राजनीतिक दलों की एक बड़ी जिम्मेदारी है। सत्ता में रहने वाला दल हो या विपक्ष में बैठा दल, उसे यह देखना चाहिए कि कोई कानून देश के नागरिकों के अधिकारों को किस तरह प्रभावित करेगा। किसी कानून का समर्थन या विरोध केवल चुनावी गणित के आधार पर नहीं होना चाहिए। आज एक दल सत्ता में है, कल दूसरा दल हो सकता है। लेकिन संविधान और नागरिकों के अधिकार स्थायी होते हैं।
इसलिए यूसीसी को लेकर राजनीतिक दलों को अपनी महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस करनी चाहिए। सरकार को मसौदा और उसके प्रावधानों पर खुलकर संवाद करना चाहिए। विपक्ष को भी केवल विरोध के लिए विरोध करने के बजाय ठोस प्रावधानों पर अपनी आपत्ति रखनी चाहिए। धार्मिक और सामाजिक संगठनों को भी अपनी चिंताएं तर्क और संवैधानिक दायरे में रखनी चाहिए।
आखिरकार भारत में कानून किसी धर्म के लिए नहीं, नागरिक के लिए बनता है। यदि समानता हमारे संविधान का मूल मूल्य है, तो नागरिक अधिकारों में अनावश्यक भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ना भी उसी भावना का हिस्सा है। यूसीसी का रास्ता संवाद, संविधान और समानता के रास्ते से निकले; राजनीतिक टकराव के रास्ते से नहीं। भारत की एकता उसकी विविधता में है, लेकिन उस विविधता के बीच नागरिक अधिकारों की समानता ही उस एकता को मजबूत आधार दे सकती है।

