संपादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सवाल पूछना कोई अपराध नहीं है। सरकार की नीतियों की आलोचना करना भी गलत नहीं है। बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि नागरिक सरकार से सवाल करें, व्यवस्था की कमियां सामने लाएं और बेहतर व्यवस्था की मांग करें। लेकिन सवाल यह है कि आलोचना और ऐसी विचारधारा के समर्थन के बीच फर्क कैसे किया जाए, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही खत्म करने और हिंसा को बदलाव का रास्ता मानती हो।
नक्सलवाद की समस्या को इसी नजरिए से समझने की जरूरत है। लंबे समय तक देश ने नक्सली हिंसा का दंश झेला है। जंगलों में रहने वाले गरीब आदिवासी, सुरक्षा बलों के जवान, जनप्रतिनिधि और आम नागरिक इसकी हिंसा का शिकार हुए हैं। इसलिए नई पीढ़ी को यह समझाना जरूरी है कि किसी भी समस्या का समाधान बंदूक नहीं हो सकती। लोकतंत्र में बदलाव का रास्ता चुनाव, संवाद, कानून और जनभागीदारी से होकर जाता है।
आज देश के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की नहीं है, बल्कि वहां के युवाओं को बेहतर भविष्य देने की भी है। शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार, कौशल विकास और तकनीकी अवसरों को दूर-दराज के गांवों तक पहुंचाना इसी लड़ाई का स्थायी समाधान है। भारत सरकार की अनेक विकास योजनाओं में इसी सोच की झलक दिखाई देती है। जिन इलाकों में कभी सरकारी व्यवस्था की पहुंच सीमित थी, वहां अब सड़क, बैंकिंग, डिजिटल सेवाएं, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार से जुड़े अवसर पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है। यह बदलाव सिर्फ विकास का काम नहीं, बल्कि लोकतंत्र में लोगों का विश्वास मजबूत करने का काम भी है।
नई पीढ़ी को विशेष रूप से सावधान रहने की जरूरत है। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के इस दौर में विचार बहुत तेजी से फैलते हैं। कोई भी विचार केवल इसलिए सही नहीं हो जाता कि उसे प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत किया गया है। युवाओं को हर विचार को तर्क, तथ्य और उसके परिणामों की कसौटी पर परखना चाहिए। किसी व्यवस्था की कमी देखकर उसके सुधार की मांग करना समझदारी है, लेकिन हिंसा, अलगाव या लोकतांत्रिक संस्थाओं को खत्म करने वाली सोच को स्वीकार करना समाधान नहीं है।
यहां ‘दिमागी नक्सलवाद’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल में भी सावधानी जरूरी है। केवल सरकार की आलोचना करने वाले, मानवाधिकारों की बात करने वाले या आदिवासियों के अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले किसी व्यक्ति को नक्सली कह देना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है। असहमति लोकतंत्र की ताकत है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति हिंसा को जायज ठहराता है, लोकतांत्रिक व्यवस्था को नष्ट करने की वकालत करता है या बंदूक के रास्ते को सामाजिक बदलाव का माध्यम बताता है, तो उसके विचारों पर सवाल उठाना भी उतना ही जरूरी है।
एक देश में बहुत सी कमियां हो सकती हैं। भ्रष्टाचार है, बेरोजगारी की समस्या है, सरकारी तंत्र में खामियां हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश है। इन कमियों को उजागर करना देशद्रोह नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिकता है। पत्रकार, लेखक, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक इन सवालों को मजबूती से उठा सकते हैं। लेकिन इसके लिए उदंडता, हिंसा या कानून को हाथ में लेने की जरूरत नहीं है। बात कितनी भी कड़वी हो, उसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से कहा जा सकता है।
सरकार की योजनाओं और नीतियों की सराहना का सबसे मजबूत आधार भी यही होना चाहिए कि उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। केंद्र और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास योजनाओं में पारदर्शिता रहे, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे और आदिवासी तथा ग्रामीण युवाओं को शिक्षा और रोजगार के वास्तविक अवसर मिलें। क्योंकि जिस युवा के हाथ में किताब, कौशल और रोजगार होगा, उसके हाथ में बंदूक पहुंचने की संभावना अपने आप कम होगी।
आज जरूरत नई पीढ़ी को किसी विचार से डराने की नहीं, बल्कि उसे सही और गलत के बीच फर्क समझाने की है। उसे बताना होगा कि देश से प्रेम का मतलब अपनी सरकार की हर बात से सहमत होना नहीं है। देश से प्रेम का मतलब है कि हम देश को बेहतर बनाने की कोशिश करें, उसकी कमियों पर सवाल उठाएं, लेकिन उसके लोकतांत्रिक ढांचे और संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने वाली हिंसक सोच का समर्थन न करें।
नक्सलवाद के खिलाफ वास्तविक जीत तब होगी, जब जंगल का बच्चा बेहतर शिक्षा पाएगा, गांव का युवा रोजगार पाएगा, आदिवासी समाज सम्मान और अधिकार के साथ आगे बढ़ेगा और हर नागरिक को यह भरोसा होगा कि अपनी बात रखने के लिए उसके पास लोकतंत्र का रास्ता खुला है। नई पीढ़ी को इसी भरोसे से जोड़ना होगा। सवाल पूछने वाले युवा चाहिए, लेकिन हिंसा को समाधान मानने वाले नहीं; व्यवस्था सुधारने वाले युवा चाहिए, व्यवस्था जलाने वाले नहीं। यही मजबूत भारत की बुनियाद है।

