सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश
झारखंड की पहचान लंबे समय से खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों वाले राज्य के रूप में रही है। लेकिन अब समय आ गया है कि राज्य अपनी पहचान केवल कोयला, लोहा और खनिज तक सीमित न रखे। आने वाला समय ज्ञान, तकनीक और हुनर का है। ऐसे में सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और हार्डवेयर जैसे आधुनिक क्षेत्रों में झारखंड के युवाओं के लिए नए अवसर पैदा करने की पहल निश्चित रूप से उत्साह बढ़ाने वाली है। आईआईटी जोधपुर और झारखंड सरकार के बीच प्रस्तावित सहयोग इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाना चाहिए।
सबसे अच्छी बात यह है कि इस पहल का दायरा केवल बड़े शहरों के इंजीनियरिंग छात्रों तक सीमित नहीं रखा गया है। आदिवासी और ग्रामीण युवाओं, आईटीआई और पॉलिटेक्निक के विद्यार्थियों, इंजीनियरिंग और डिप्लोमा छात्रों के साथ छात्राओं और महिलाओं को भी इससे जोड़ने की योजना है। यही वह सोच है जिसकी जरूरत झारखंड को लंबे समय से रही है। विकास तभी सार्थक होगा, जब गांव के बच्चे को भी वही अवसर मिले जो शहर के किसी बड़े संस्थान में पढ़ने वाले बच्चे को मिलता है।
सेमीकंडक्टर का नाम आज भले ही बहुत तकनीकी लगे, लेकिन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का शायद ही कोई हिस्सा इससे अछूता है। मोबाइल फोन से लेकर कंप्यूटर, कार, मशीन, चिकित्सा उपकरण और आधुनिक उद्योग तक, हर जगह चिप और इलेक्ट्रॉनिक्स की भूमिका है। दुनिया भर में सेमीकंडक्टर उद्योग तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में यदि झारखंड के युवा अभी से इस क्षेत्र के लिए तैयार होते हैं तो आने वाले वर्षों में उनके सामने रोजगार के साथ-साथ अपना कारोबार शुरू करने के भी बड़े अवसर होंगे।
प्रस्तावित कार्यक्रम में केवल किताब पढ़ाने की बात नहीं है। वीएलएसआई डिजाइन, एम्बेडेड सिस्टम, पीसीबी, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, सेमीकंडक्टर की बुनियादी समझ, लैब प्रशिक्षण और निर्माण तकनीक जैसे विषयों में व्यावहारिक प्रशिक्षण देने की योजना है। यानी युवा केवल प्रमाणपत्र लेकर बाहर नहीं निकलेंगे, बल्कि उन्हें मशीनों और तकनीक के साथ काम करने का वास्तविक अनुभव भी मिल सकता है। यही प्रशिक्षण आगे चलकर उन्हें उद्योग की जरूरत के मुताबिक तैयार करेगा।
यहां झारखंड सरकार की भूमिका की भी सराहना करनी चाहिए कि उसने राज्य के युवाओं को भविष्य की तकनीक से जोड़ने की दिशा में पहल की है। सरकार के लिए यह जरूरी है कि ऐसी योजनाएं केवल बैठक, समझौते और कागजों तक सीमित न रहें। प्रशिक्षण केंद्र वास्तव में जमीन पर बनें, ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक जानकारी पहुंचे, चयन की प्रक्रिया पारदर्शी हो और प्रशिक्षण के बाद रोजगार तथा उद्यमिता से जोड़ने की व्यवस्था भी बने। अगर यह पूरी कड़ी मजबूत होती है तो इसका असर बहुत दूर तक जाएगा।
लेकिन सरकार के साथ युवाओं की भी जिम्मेदारी है। अवसर दरवाजे तक आ जाए और युवा उसे पहचान ही न पाए, तो इसका कोई फायदा नहीं होगा। झारखंड के विद्यार्थियों को पारंपरिक सरकारी नौकरी की तैयारी के साथ-साथ तकनीकी दुनिया में भी अपनी संभावनाएं तलाशनी होंगी। हर युवा इंजीनियर बने, यह जरूरी नहीं; लेकिन हर युवा अपने भीतर मौजूद हुनर को पहचानकर नई तकनीक सीख सकता है।
खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के युवाओं को यह समझना होगा कि अब नौकरी केवल अपने जिले या राज्य तक सीमित नहीं है। अगर किसी युवक या युवती के पास अच्छी तकनीकी क्षमता है तो उसके लिए देश और दुनिया में अवसर हैं। जरूरत है अंग्रेजी से डरने के बजाय तकनीकी भाषा सीखने की, कंप्यूटर से घबराने के बजाय उसके साथ दोस्ती करने की और नई चीजों को सीखने की आदत डालने की।
झारखंड के लिए यह सिर्फ रोजगार का अवसर नहीं, आर्थिक बदलाव का रास्ता भी बन सकता है। यदि यहां के हजारों युवा आधुनिक तकनीक में प्रशिक्षित होते हैं, कंपनियों में रोजगार पाते हैं और कुछ अपना स्टार्टअप या तकनीकी उद्यम खड़ा करते हैं, तो इसका लाभ परिवार से लेकर पूरे राज्य की अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा। आज का प्रशिक्षित युवा कल का रोजगार देने वाला उद्यमी भी बन सकता है।
इसलिए सरकार को इस पहल को पूरी गंभीरता से आगे बढ़ाना चाहिए और युवाओं को भी पूरे उत्साह से इसका लाभ उठाना चाहिए। झारखंड के पास प्राकृतिक संपदा पहले से है, अब उसे मानव संसाधन की ताकत में बदलने का समय है। खदानों से निकलने वाली संपदा सीमित है, लेकिन हुनरमंद दिमाग की क्षमता असीमित होती है। अगर झारखंड अपने युवाओं को नई तकनीक से जोड़ने में सफल रहा तो आने वाला समय सिर्फ रोजगार देने वाला नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर झारखंड बनाने वाला हो सकता है।

