JSSC-CGL से TDPL तक: परीक्षा रद्द, अब चयनितों की नौकरी पर फैसला जरूरी

संपादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश 

- परीक्षा रद्द हुई तो नियुक्तियां भी हों निरस्त, युवाओं को मिले फिर मौका

- TDPL विवाद का निर्णायक सवाल: पद पर रहेंगे चयनित या होगी पुनर्परीक्षा?

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर चल रहा आंदोलन अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। लंबे छात्र आंदोलन, राजनीतिक दबाव और परीक्षा व्यवस्था पर उठते गंभीर सवालों के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 17 अगस्त को कैबिनेट की विशेष बैठक के बाद JSSC-CGL समेत TDPL से जुड़ी परीक्षाओं, उनके परिणामों, चयन और उससे संबंधित प्रक्रियाओं को रद्द करने की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि वर्ष 2014 से हुई छोटी-बड़ी गड़बड़ियों की जांच की जाएगी और परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में समिति गठित की जाएगी।

सरकार का फैसला छात्र आंदोलन के दबाव में आया हो या शासन की अपनी समीक्षा का परिणाम हो, लेकिन अब असली परीक्षा सरकार की है। परीक्षा रद्द करने की घोषणा करना एक निर्णय है, लेकिन उस परीक्षा के आधार पर जिन लोगों का चयन हो चुका है, उन्हें लेकर स्पष्ट नीति बनाना उससे कहीं बड़ी चुनौती है। यहीं से वह सवाल पैदा होता है, जिसे अब सरकार टाल नहीं सकती—जब परीक्षा, परिणाम और चयन प्रक्रिया ही रद्द कर दी गई है तो उस प्रक्रिया से मिली सरकारी नौकरी का क्या होगा?

1,932 चयनित अभ्यर्थी और सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल

JSSC-CGL 2023 इस पूरे विवाद का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। इस परीक्षा के माध्यम से कुल 2,025 पदों पर नियुक्ति होनी थी और आयोग ने 1,932 अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया था। पदवार देखें तो सहायक प्रशाखा पदाधिकारी के 863 पदों के विरुद्ध 847, कनीय सचिवालय सहायक के 343 पदों के विरुद्ध 293, श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी के 182 पदों के विरुद्ध 170, प्लानिंग असिस्टेंट के पांच पदों के विरुद्ध चार, प्रखंड कल्याण पदाधिकारी के 195 पदों के विरुद्ध 191, प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी के 252 पदों के विरुद्ध 249 तथा अंचल निरीक्षक-सह-कानूनगो के 185 पदों के विरुद्ध 178 अभ्यर्थी चयनित हुए। कुल मिलाकर 2,025 रिक्तियों के विरुद्ध 1,932 चयन हुए।

यह केवल परीक्षा परिणाम की संख्या नहीं है। इसके पीछे 1,932 परिवारों की उम्मीदें, सरकारी सेवा में पहुंचे कर्मचारी, विभिन्न जिलों में हुई पदस्थापनाएं और राज्य के प्रशासनिक तंत्र में शामिल हो चुके लोग हैं। इसलिए अब सरकार को यह बताना होगा कि जब वह परीक्षा और चयन प्रक्रिया को ही निरस्त कर रही है, तो इन 1,932 चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्तियों का कानूनी और प्रशासनिक भविष्य क्या है?

  • क्या परिणाम रद्द होगा, लेकिन नौकरी बची रहेगी?
  • क्या नियुक्ति पत्र वैध माना जाएगा?
  • क्या जिलों में पदस्थापित कर्मचारी पूर्ववत काम करते रहेंगे?
  • क्या उनकी सेवाएं केवल जांच पूरी होने तक जारी रहेंगी?
  • या फिर सरकार उन्हें पद से हटाकर नए सिरे से चयन प्रक्रिया शुरू करेगी?

इन सवालों का जवाब जितनी जल्दी दिया जाएगा, उतना ही बेहतर होगा।

मामला केवल JSSC-CGL तक सीमित नहीं

यह विवाद केवल JSSC-CGL तक सीमित नहीं है। JPSC की परीक्षा व्यवस्था भी गंभीर जांच के घेरे में है। जुलाई 2026 में CID ने JPSC की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच के दौरान JPSC की तत्कालीन उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता सहित TSR Data Processing Private Limited यानी TDPL के निदेशक रामवीर सिंह तथा अन्य लोगों को गिरफ्तार किया था। जांच के दौरान JPSC के पूर्व अध्यक्ष एल. खियांगते के आवास पर भी तलाशी ली गई। इस पूरे घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि JPSC की 2023 संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा का अंतिम परिणाम 25 जुलाई 2025 को जारी हुआ था और 342 अभ्यर्थियों को विभिन्न राज्य सेवाओं के लिए सफल घोषित किया गया था। JPSC के आधिकारिक परिणाम में चयनित अभ्यर्थियों को संबंधित सेवाएं आवंटित की गई हैं। इन 342 चयनित अभ्यर्थियों में झारखंड प्रशासनिक सेवा, झारखंड राज्य पुलिस सेवा, वित्त सेवा, श्रम सेवा, सहकारिता, शिक्षा, उत्पाद और अन्य राज्य सेवाओं के पद शामिल हैं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार 207 पद झारखंड प्रशासनिक सेवा, 35 झारखंड राज्य पुलिस सेवा सहित विभिन्न सेवाओं में चयन हुआ।

अब सवाल यह है कि यदि जांच में किसी परीक्षा की पूरी प्रक्रिया ही अविश्वसनीय या दोषपूर्ण पाई जाती है तो क्या उसके आधार पर चयनित अधिकारी सामान्य रूप से सेवा करते रहेंगे? यह प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है। यह व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है।

सरकार को जिलावार सच सामने रखना होगा

सरकार को अब केवल प्रेस विज्ञप्ति जारी करके काम नहीं चलाना चाहिए। उसे एक सार्वजनिक और आधिकारिक डेटाबेस जारी करना चाहिए। उसमें यह बताया जाए कि विवादित अथवा निरस्त की गई परीक्षा के आधार पर— कितने अभ्यर्थियों का चयन हुआ? कितने अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिली? कितने लोग प्रशिक्षण में हैं? कितने लोग किस विभाग में कार्यरत हैं? कौन किस जिले में पदस्थापित है? किस पद पर कितने लोग कार्यरत हैं? और सरकार के निर्णय के बाद उनकी सेवा स्थिति क्या होगी?

मसलन, यदि JSSC-CGL से चयनित कोई सहायक प्रशाखा पदाधिकारी किसी जिले में पदस्थापित है, कोई प्रखंड कल्याण पदाधिकारी किसी प्रखंड में काम कर रहा है और कोई प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जिम्मेदारी संभाल रहा है, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि उनकी नियुक्ति की वैधानिक स्थिति क्या है। यह सूचना छिपाने से संदेह कम नहीं होगा, बल्कि बढ़ेगा।

परीक्षा रद्द और नौकरी बरकरार—क्या यह संभव है?

यहीं सरकार के सामने सबसे कठिन नैतिक और प्रशासनिक प्रश्न खड़ा होता है। यदि सरकार कहती है कि परीक्षा में इतनी गंभीर समस्या थी कि परीक्षा ही रद्द करनी पड़ी, परिणाम रद्द करना पड़ा और चयन प्रक्रिया भी निरस्त करनी पड़ी, तो उसी चयन के आधार पर मिली नियुक्ति को बिना किसी समीक्षा के जारी रखना तार्किक रूप से कठिन होगा। परीक्षा अविश्वसनीय, परिणाम अविश्वसनीय, चयन अविश्वसनीय—लेकिन नियुक्ति विश्वसनीय? यह सवाल आने वाले दिनों में सरकार से निश्चित रूप से पूछा जाएगा।

हालांकि इसका उत्तर केवल भावनाओं के आधार पर नहीं दिया जा सकता। नियुक्ति समाप्त करने के लिए संबंधित सेवा नियमों, नियुक्ति आदेश, न्यायालयों के निर्देश और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना होगा। सरकार को ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए जिसे बाद में न्यायालय में चुनौती देकर वर्षों तक लटकाया जा सके। यही कारण है कि इस मामले में सरकार की सबसे बड़ी जरूरत कठोरता के साथ कानूनी तैयारी की है।

निर्दोष अभ्यर्थी और दोषपूर्ण व्यवस्था में फर्क जरूरी

यह बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि किसी परीक्षा में अनियमितता का आरोप लगने मात्र से हर सफल अभ्यर्थी दोषी नहीं हो जाता। हजारों अभ्यर्थियों ने मेहनत से परीक्षा दी होगी। किसी को प्रश्नपत्र लीक होने की जानकारी नहीं रही होगी, किसी ने किसी एजेंसी से संपर्क नहीं किया होगा और किसी ने कोई अनुचित साधन नहीं अपनाया होगा। यदि परीक्षा व्यवस्था में संस्थागत गड़बड़ी हुई है तो उसका पूरा बोझ केवल अभ्यर्थियों पर डाल देना भी न्यायसंगत नहीं होगा। इसलिए सरकार को दोषी और निर्दोष की पहचान करने की प्रक्रिया बनानी होगी।

लेकिन इसके साथ एक दूसरा प्रश्न भी है—यदि पूरी परीक्षा की निष्पक्षता ही ऐसी स्थिति में पहुंच गई है कि सरकार को उसे रद्द करना पड़ा, तो केवल यह कह देना कि “इन लोगों ने व्यक्तिगत रूप से गलती नहीं की” क्या नियुक्ति को स्वतः वैध बना देता है? निश्चित रूप से नहीं। नियुक्ति का आधार केवल अभ्यर्थी का व्यक्तिगत आचरण नहीं, बल्कि वैध, निष्पक्ष और विश्वसनीय चयन प्रक्रिया भी है। यही वह बारीक अंतर है जिसे सरकार को समझना होगा।

और यहीं से राजनीति का खतरा शुरू होता है

इस मामले का सबसे चिंताजनक पक्ष यही है कि भर्ती परीक्षा का विवाद कहीं राजनीतिक सौदेबाजी का विषय न बन जाए। परीक्षा रद्द कर दी गई। आंदोलन समाप्त हो गया। जांच समिति बन गई। कुछ गिरफ्तारियां हो गईं। उसके बाद धीरे-धीरे मामला ठंडे बस्ते में चला गया और सरकारी पदों पर बैठे लोग वर्षों तक उसी पद पर बने रहे—यदि ऐसा हुआ तो छात्र आंदोलन की पूरी लड़ाई अधूरी रह जाएगी। और यहीं से कई तरह की राजनीति के दरवाजे खुलेंगे। सरकार पर आरोप लगेगा कि उसने छात्रों का आंदोलन शांत करने के लिए परीक्षा तो रद्द कर दी, लेकिन सरकारी नौकरी पा चुके लोगों को बचा लिया। विपक्ष इसे राजनीतिक संरक्षण का मुद्दा बनाएगा। नियुक्त अभ्यर्थी न्यायालय जाएंगे। नए अभ्यर्थी कहेंगे कि जब परीक्षा रद्द हुई तो हमें फिर मौका क्यों नहीं मिला? पुराने अभ्यर्थी कहेंगे कि हमारी कोई गलती नहीं थी तो हमें क्यों हटाया गया?

अर्थात यदि सरकार ने शुरुआत में ही स्पष्ट और समयबद्ध नीति नहीं बनाई तो यह मामला एक नई कानूनी और राजनीतिक भूलभुलैया में फंस सकता है। इसलिए सरकार को आधे-अधूरे फैसले से बचना होगा।

क्या तत्काल पदच्युत करना ही रास्ता है?

न्यायोचित दृष्टि से स्पष्ट मत होना चाहिए कि यदि किसी परीक्षा और उसके परिणाम को सरकार औपचारिक रूप से निरस्त कर चुकी है, तो उस परीक्षा के आधार पर की गई नियुक्तियों को भी सामान्य रूप से जारी रखना उचित नहीं होगा। लेकिन “तत्काल पदच्युत” का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि बिना किसी आदेश, सुनवाई या वैधानिक प्रक्रिया के रातों-रात सभी को नौकरी से निकाल दिया जाए। ऐसा करना स्वयं एक नया विवाद पैदा कर सकता है। बेहतर और अधिक प्रभावी रास्ता यह होगा कि सरकार एक समयबद्ध विशेष सेवा-समीक्षा प्रक्रिया तत्काल शुरू करे और जिन नियुक्तियों का आधार निरस्त चयन है, उनकी वैधानिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से नियमित पद से अलग किया जाए। आवश्यकता के अनुसार उन्हें कार्यमुक्त/सेवा से पृथक रखने और पदों को पुनर्भर्ती के लिए रिक्त घोषित करने की प्रक्रिया अपनाई जाए। इस पूरी प्रक्रिया को न्यायिक चुनौती से बचाने के लिए प्रत्येक अभ्यर्थी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए और सरकार के आदेश स्पष्ट, कारणयुक्त तथा नियमसम्मत हों। अर्थात नरमी नहीं, लेकिन मनमानी भी नहीं। यही संतुलन सरकार के फैसले को विवादास्पद होने से बचा सकता है।

इस विवाद से निकलने का सबसे व्यावहारिक रास्ता एक नई, निष्पक्ष और स्वतंत्र पुनर्परीक्षा हो सकता है। जिन अभ्यर्थियों ने पहले परीक्षा दी थी, उन्हें फिर मौका दिया जाए। उन्हें दोबारा आवेदन शुल्क से राहत मिले। उम्र सीमा में विशेष छूट दी जाए। पहले आवेदन करने वालों के लिए आवेदन प्रक्रिया सरल रखी जाए। और परीक्षा ऐसी एजेंसी या व्यवस्था से कराई जाए जिस पर किसी प्रकार का संदेह न हो। नई परीक्षा में जो अभ्यर्थी सफल हों, उन्हें नियमानुसार अंतिम नियुक्ति दी जाए।

इस व्यवस्था का एक बड़ा लाभ यह होगा कि सरकार किसी व्यक्ति को “दोषी” घोषित किए बिना चयन प्रक्रिया को ही फिर से निष्पक्ष आधार पर स्थापित कर सकेगी। यह रास्ता राजनीतिक विवाद को भी कम कर सकता है।

लेकिन तब तक सरकारी काम कौन करेगा?

यह भी व्यावहारिक प्रश्न है। यदि हजारों पद खाली कर दिए जाते हैं तो सरकारी कार्यालयों, प्रखंडों और जिलों में काम प्रभावित हो सकता है। इसलिए सरकार को तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी। सेवानिवृत्त अधिकारियों की संविदात्मक सेवाएं, विभागीय पदोन्नति, अतिरिक्त प्रभार या अन्य वैधानिक व्यवस्थाओं से अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था बनाई जा सकती है। लेकिन विवादित नियुक्ति को केवल प्रशासन चलाने के नाम पर स्थायी संरक्षण देना उचित नहीं होगा।

सरकार को नई भर्ती की समयसीमा भी घोषित करनी चाहिए—मसलन छह माह, नौ माह या अधिकतम एक वर्ष के भीतर पूरी चयन प्रक्रिया समाप्त करने का स्पष्ट लक्ष्य।

342 अधिकारी और 1,932 कर्मचारी—सवाल संख्या से कहीं बड़ा है

JSSC-CGL के 1,932 चयन और JPSC सिविल सेवा के 342 चयन को केवल जोड़कर देखने से समस्या का पूरा आकार सामने नहीं आता। इनके अलावा अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाएं भी जांच के दायरे में आती हैं। JPSC ने हाल में कथित परीक्षा अनियमितताओं की जांच के बीच कई परीक्षाएं स्थगित की हैं—इनमें सिविल सेवा मुख्य परीक्षा, सिविल जज, सहायक लोक अभियोजक, इंस्पेक्टर ऑफ फैक्ट्रीज, प्रोजेक्ट मैनेजर और बॉयलर इंस्पेक्टर जैसी परीक्षाएं शामिल हैं। इससे साफ है कि समस्या किसी एक परीक्षा के परिणाम तक सीमित नहीं है। यह भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता का संकट बन चुकी है। यही कारण है कि सरकार को केवल TDPL का अध्याय बंद करने के बजाय पूरी परीक्षा प्रणाली की संरचना पर पुनर्विचार करना चाहिए।

निजी एजेंसी पर निर्भरता की भी समीक्षा हो

परीक्षा संचालन में निजी एजेंसियों की भूमिका को पूरी तरह समाप्त करना आवश्यक है या नहीं, यह अलग बहस है। लेकिन जिस एजेंसी पर परीक्षा प्रक्रिया में गंभीर सवाल उठे हों, उसकी भूमिका, चयन की प्रक्रिया, अनुबंध की शर्तें, निगरानी व्यवस्था और अधिकारियों की जवाबदेही की पूरी समीक्षा होनी चाहिए। मामला इसलिए भी गंभीर है कि CID की जांच में TDPL के निदेशक की गिरफ्तारी हुई है और एजेंसी की भूमिका पर जांच चल रही है। ऐसे में सरकार को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि निजी एजेंसी को परीक्षा का काम किस प्रक्रिया से दिया गया, किस स्तर पर निगरानी हुई और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ तो जिम्मेदार सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई। सिर्फ एजेंसी को दोषी ठहराकर सरकारी तंत्र को निर्दोष घोषित करना भी उचित नहीं होगा।

अब सरकार को क्या करना चाहिए?

झारखंड सरकार के सामने अब एक स्पष्ट कार्ययोजना होनी चाहिए।

  1. TDPL से संबंधित प्रत्येक परीक्षा की आधिकारिक सूची और उसकी वास्तविक भूमिका सार्वजनिक की जाए।
  2. प्रत्येक परीक्षा के पदवार परिणाम, चयनित अभ्यर्थियों की संख्या और नियुक्ति की स्थिति सार्वजनिक की जाए।
  3. जिन परीक्षाओं के परिणाम और चयन निरस्त किए गए हैं, उनसे हुई नियुक्तियों की वैधानिक समीक्षा तत्काल शुरू हो।
  4. जिन पदों पर नियुक्तियां विवादित चयन प्रक्रिया के आधार पर हुई हैं, उन्हें नई भर्ती के लिए चिन्हित किया जाए।
  5. पूर्व अभ्यर्थियों को पुनर्परीक्षा में प्राथमिक सुविधा, आयु सीमा में उचित छूट और आवेदन शुल्क में राहत दी जाए।
  6. नई परीक्षा पूरी तरह पारदर्शी व्यवस्था में कराई जाए।
  7. प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परिणाम जारी होने तक हर चरण की जिम्मेदारी किसी एक निजी एजेंसी पर छोड़ने के बजाय बहुस्तरीय निगरानी व्यवस्था बनाई जाए।
  8. और पूरी प्रक्रिया के लिए समयसीमा तय हो।

आज का संकट झारखंड सरकार के लिए केवल राजनीतिक संकट नहीं है। यह व्यवस्था को ठीक करने का अवसर भी है। यदि सरकार केवल आंदोलन खत्म कराने के लिए परीक्षा रद्द करती है तो कुछ महीनों बाद यही सवाल फिर खड़ा होगा। लेकिन यदि वह इस अवसर पर भर्ती व्यवस्था में ऐसा सुधार करती है कि अगले दस वर्षों तक कोई युवा परीक्षा की पारदर्शिता पर सवाल न उठाए, तो यही संकट शासन की उपलब्धि बन सकता है।

मुख्यमंत्री ने स्वयं कहा है कि परीक्षा संचालन के लिए एसओपी पहले से मौजूद थी और उसका पालन किया जाता तो गड़बड़ियां नहीं होतीं। तो अब सवाल केवल नई एसओपी बनाने का नहीं है। सवाल यह है कि पुरानी एसओपी का पालन क्यों नहीं हुआ और जिन अधिकारियों या एजेंसियों ने उसका पालन नहीं कराया, उनकी जवाबदेही कौन तय करेगा?

अंतिम सवाल—सरकार किसके साथ खड़ी है?

झारखंड का युवा आज सरकार से सिर्फ नौकरी नहीं मांग रहा। वह निष्पक्ष अवसर मांग रहा है। जो पढ़ा, जिसने तैयारी की, जिसने परीक्षा दी और जिसका भविष्य किसी कथित अनियमितता के कारण अंधेरे में चला गया, उसके साथ न्याय होना चाहिए। सरकार को यह भी समझना होगा कि सरकारी नौकरी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। वह सार्वजनिक पद है। उसका आधार केवल नियुक्ति पत्र नहीं, बल्कि वैध और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया है। इसलिए हमारा स्पष्ट मत है कि जिस चयन प्रक्रिया को सरकार ने ही निरस्त कर दिया है, उसके आधार पर सरकारी पदों पर बने रहना सामान्य स्थिति नहीं मानी जानी चाहिए। ऐसे सभी पदधारकों की सेवा स्थिति तत्काल प्रभाव से पुनरीक्षित होनी चाहिए और आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया पूरी करते हुए उन्हें विवादित नियुक्ति के आधार पर पद पर बने रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इसके साथ ही पुराने अभ्यर्थियों को पूरी निष्पक्षता के साथ पुनर्परीक्षा का अवसर दिया जाए। जो वास्तव में योग्य हैं, वे फिर चयनित होकर लौटें। जो चयन में सफल नहीं हो पाते, उनके स्थान पर अधिक योग्य युवा आएं। और यह पूरी प्रक्रिया इतनी पारदर्शी हो कि कल कोई यह न कह सके कि सरकार ने किसी को बचाया या किसी को राजनीतिक कारणों से हटाया। नौकरी बचाना सरकार का लक्ष्य नहीं होना चाहिए; योग्य व्यक्ति को नौकरी दिलाना उसका लक्ष्य होना चाहिए। TDPL विवाद में सरकार के सामने यही सबसे बड़ी कसौटी है। यदि वह परीक्षा रद्द करने के बाद नियुक्तियों पर भी स्पष्ट, निष्पक्ष, समयबद्ध और कानूनसम्मत फैसला करती है तथा उन्हीं पदों पर ईमानदार पुनर्भर्ती कराती है, तो यह केवल एक परीक्षा विवाद का समाधान नहीं होगा। यह झारखंड की भर्ती व्यवस्था में भरोसा बहाल करने की शुरुआत होगी। और यदि परीक्षा तो रद्द हो जाए, परिणाम भी रद्द हो जाए, चयन भी रद्द हो जाए, लेकिन उन्हीं चयनित लोगों की नौकरियां बचाने के लिए कोई नया रास्ता खोज लिया जाए, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेगा—क्या सरकार ने व्यवस्था सुधारी है या केवल आंदोलन शांत किया है? झारखंड के लाखों प्रतियोगी परीक्षार्थियों को अब इसी प्रश्न के उत्तर का इंतजार है।

सरकार को राजनीति से ऊपर उठकर एक ही संदेश देना चाहिए—परीक्षा निष्पक्ष होगी, चयन पारदर्शी होगा और सरकारी नौकरी केवल योग्यता के आधार पर मिलेगी। यही युवाओं के साथ न्याय है और यही सुशासन की पहली शर्त भी।