हिन्दी को सम्मान हमारे रोजमर्रा के व्यवहार से मिलेगा

– पूर्णेन्दु पुष्पेश

14 सितंबर आते ही हिन्दी के प्रति हमारा प्रेम अचानक जाग जाता है। सरकारी कार्यालयों में हिन्दी दिवस मनाया जाता है, स्कूलों में भाषण और कविता प्रतियोगिताएं होती हैं, मंचों पर हिन्दी की महानता बताई जाती है और सोशल मीडिया पर हिन्दी के सम्मान की बातें लिखी जाती हैं। लेकिन जैसे ही 14 सितंबर गुजरता है, हिन्दी फिर अपनी जगह तलाशने लगती है। सवाल यही है कि आखिर हिन्दी को सम्मान देने के लिए हमें एक दिन की जरूरत क्यों पड़ती है? अगर हिन्दी सचमुच हमारी भाषा है, हमारी पहचान और हमारे स्वाभिमान का हिस्सा है, तो उसका इस्तेमाल केवल हिन्दी दिवस तक सीमित क्यों रहे?

दुनिया में हिन्दी की स्थिति पर हम गर्व करते हैं। हिन्दी बोलने-समझने वालों की संख्या बड़ी है। विदेशों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है, हिन्दी के कार्यक्रम हो रहे हैं और भारत की संस्कृति के साथ हिन्दी की पहचान भी मजबूत हो रही है। यह अच्छी बात है। लेकिन दुनिया से हिन्दी का सम्मान मांगने से पहले हमें अपने घर में हिन्दी को सम्मान देना होगा। जिस भाषा को हम अपने बच्चों के सामने केवल संस्कृति और भावनाओं की भाषा बना देंगे, उसे रोजगार, ज्ञान और तकनीक से नहीं जोड़ेंगे, तो आने वाली पीढ़ी उसे अपने भविष्य की भाषा क्यों मानेगी?

हमारी सबसे बड़ी समस्या हिन्दी का कम बोलने वाले लोग नहीं हैं। समस्या यह है कि हिन्दी में अवसर कम हैं। आज भी उच्च शिक्षा, शोध, तकनीक, प्रशासन और रोजगार के बड़े हिस्से में अंग्रेजी का दबदबा है। एक माता-पिता जब अपने बच्चे के भविष्य के बारे में सोचते हैं तो उनके सामने सबसे बड़ा सवाल होता है कि किस भाषा में पढ़ने से नौकरी और आगे बढ़ने के अवसर मिलेंगे। यही कारण है कि घर में हिन्दी बोलने वाला परिवार भी बच्चे को अंग्रेजी माध्यम स्कूल में भेजने को मजबूर महसूस करता है। यह हिन्दी के प्रति नफरत नहीं, बल्कि व्यवस्था से पैदा हुआ डर है।

हमने हिन्दी को भावनाओं की भाषा और अंग्रेजी को सफलता की भाषा मान लिया है। बच्चे को हिन्दी में कविता सुनाने पर गर्व होता है, लेकिन उसकी पढ़ाई हिन्दी में कराने में संकोच होता है। हिन्दी में कहानी लिखने पर खुशी होती है, लेकिन विज्ञान, तकनीक या उच्च शिक्षा हिन्दी में उपलब्ध कराने की मांग उतनी जोर से नहीं उठती। जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, हिन्दी दिवस मनाने से बहुत बड़ा बदलाव नहीं आएगा।

सरकारी व्यवस्था में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। हिन्दी दिवस के दिन हिन्दी में काम करने के संकल्प लिए जाते हैं, लेकिन साल के बाकी दिनों में कई महत्वपूर्ण काम अंग्रेजी में ही चलते रहते हैं। भाषा को समारोह की चीज बना देने से उसका विकास नहीं होता। हिन्दी की असली परीक्षा तब होगी, जब किसी आम आदमी को सरकारी कार्यालय में अपना काम हिन्दी में कराने में परेशानी न हो। जब सरकारी योजनाओं की जानकारी सरल हिन्दी में उपलब्ध हो, जब कानून और नियम आम आदमी आसानी से समझ सके और जब प्रशासनिक कामकाज में हिन्दी का इस्तेमाल सहज रूप से हो।

हिन्दी को मजबूत करने का मतलब अंग्रेजी का विरोध करना भी नहीं है। अंग्रेजी सीखना गलत नहीं है। दुनिया की दूसरी भाषाएं सीखना भी जरूरी है। लेकिन अपनी भाषा को कमजोर करके दूसरी भाषा को मजबूत बनाना समझदारी नहीं है। हमें अंग्रेजी भी सीखनी चाहिए और हिन्दी में भी उतनी ही मजबूती पैदा करनी चाहिए। असली लक्ष्य यह होना चाहिए कि किसी युवा के सामने यह मजबूरी न हो कि अच्छी नौकरी या उच्च शिक्षा के लिए उसे अपनी भाषा छोड़नी ही पड़ेगी।

आज तकनीक हिन्दी के सामने एक बड़ा अवसर लेकर आई है। मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में हिन्दी में ज्ञान की सामग्री तेजी से बढ़ सकती है। विज्ञान, चिकित्सा, कानून, इंजीनियरिंग, प्रबंधन और तकनीक से जुड़ी अच्छी सामग्री सरल हिन्दी में तैयार होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को हिन्दी में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री तैयार करनी चाहिए। तभी हिन्दी केवल बोलचाल की भाषा नहीं रहेगी, बल्कि ज्ञान और रोजगार की भाषा भी बनेगी।

मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। हिन्दी को लोकप्रिय बनाने के नाम पर भाषा को इतना कठिन बनाने की जरूरत नहीं है कि आम आदमी उससे दूर हो जाए। दूसरी ओर अंग्रेजी के शब्दों को जरूरत से ज्यादा मिलाकर हिन्दी को ऐसा रूप देना भी ठीक नहीं, जिसे पढ़ने वाला खुद अपनी भाषा में अजनबी महसूस करे। भाषा समय के साथ बदलती है। हिन्दी भी बदलेगी और नए शब्द अपनाएगी। लेकिन उसकी सहजता, स्पष्टता और अभिव्यक्ति की ताकत बनी रहनी चाहिए।

सबसे जरूरी बात यह है कि हिन्दी का इस्तेमाल करना शुरू किया जाए। घर में, स्कूल में, कार्यालय में, बाजार में, मोबाइल पर, सोशल मीडिया पर और अपने कामकाज में। हिन्दी को केवल भाषण की भाषा नहीं, व्यवहार की भाषा बनाना होगा। बच्चे हिन्दी में सवाल पूछें, हिन्दी में विज्ञान समझें, हिन्दी में नई चीजें सीखें और हिन्दी में अपने सपने देखने में उन्हें कोई झिझक न हो—यही हिन्दी के लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा।

14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाना अच्छी परंपरा है, लेकिन हिन्दी का असली दिवस अगले दिन से शुरू होना चाहिए। 15 सितंबर से लेकर अगले 13 सितंबर तक हिन्दी का इस्तेमाल लगातार होना चाहिए। हिन्दी को माला पहनाने से ज्यादा जरूरी है उसे काम देना। उसे भाषण देने से ज्यादा जरूरी है उसे अवसर देना।

हिन्दी तभी मजबूत होगी जब वह हमारे घर की भाषा होने के साथ-साथ ज्ञान, तकनीक, प्रशासन, रोजगार और आधुनिक जीवन की भी भाषा बनेगी। इसलिए इस बार हिन्दी दिवस पर सिर्फ यह संकल्प न लें कि हम हिन्दी का सम्मान करेंगे। संकल्प यह हो कि हम पूरे वर्ष हिन्दी का इस्तेमाल करेंगे, उसमें पढ़ेंगे, लिखेंगे, सीखेंगे और नए ज्ञान को हिन्दी में उपलब्ध कराने की कोशिश करेंगे।

क्योंकि हिन्दी को सबसे बड़ा सम्मान किसी समारोह से नहीं, हमारे रोजमर्रा के व्यवहार से मिलेगा।