सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश
कभी-कभी इतिहास बहुत देर से इंसाफ करता है। पीलीभीत में पाकिस्तान से आए विस्थापित परिवारों को नागरिकता और जमीन का मालिकाना हक मिलना ऐसी ही एक घटना है। यह फैसला सिर्फ कुछ हजार परिवारों को कागज का एक प्रमाणपत्र देने की बात नहीं है, बल्कि उन लोगों के लिए एक लंबी प्रतीक्षा का अंत है, जिन्होंने दशकों पहले अपना घर छोड़ा, भारत आए, यहां मेहनत की, खेत बनाए, परिवार बसाए और फिर भी पूरी तरह अपना कहलाने के अधिकार से वंचित रहे।
सवाल सीधा है। अगर कोई व्यक्ति धार्मिक प्रताड़ना के कारण अपना घर छोड़ने को मजबूर हो जाए और उसके लिए वापस लौटने का रास्ता बंद हो, तो वह जाएगा कहां? पाकिस्तान के बनने के बाद वहां से बड़ी संख्या में हिंदू, सिख और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों के लोग विस्थापित हुए। पूर्वी पाकिस्तान से आए अनेक परिवार भारत के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे। पीलीभीत और आसपास के इलाकों में बसे परिवारों ने जंगल और बंजर जमीन को मेहनत से खेती योग्य बनाया। पीढ़ियां बीत गईं, लेकिन नागरिकता का सवाल बना रहा।
आज जब ऐसे परिवारों को नागरिकता मिलती है तो इसे केवल चुनावी चश्मे से देखना ठीक नहीं होगा। राजनीति में हर फैसले के चुनावी मायने हो सकते हैं, लेकिन हर फैसला केवल वोट के लिए लिया गया हो, यह मान लेना भी उतना ही गलत है। किसी सरकार से यह पूछा जरूर जाना चाहिए कि उसने फैसला क्यों लिया, प्रक्रिया क्या रही और पात्रता कैसे तय हुई। लेकिन यदि जांच-पड़ताल के बाद यह साबित होता है कि सामने वाला परिवार वास्तव में धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर भारत आया था, दशकों से यहीं रह रहा है और देश के कानून का पालन कर रहा है, तो उसे नागरिकता देने में आखिर आपत्ति किस बात की है?
भारत की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह केवल एक राजनीतिक भूभाग नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से हिंदू सभ्यता की मुख्य भूमि रहा है। दुनिया में जहां-जहां हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक स्थिति में है, वहां उनके लिए भारत स्वाभाविक रूप से सबसे सुरक्षित सांस्कृतिक आश्रय है। हिंदुओं के लिए दुनिया में भारत जैसा दूसरा देश नहीं है, जहां वे अपनी आस्था, परंपरा, भाषा और संस्कृति के साथ बड़े पैमाने पर सुरक्षित होकर रह सकें। इसलिए यदि किसी हिंदू परिवार को धार्मिक उत्पीड़न के कारण अपना देश छोड़ना पड़े और वह भारत की शरण में आए, तो उसके लिए भारत के दरवाजे खुले रखना एक मानवीय और सभ्यतागत जिम्मेदारी भी है।
लेकिन यहां एक बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए। शरण और घुसपैठ एक ही चीज नहीं हैं। भारत को अवैध घुसपैठ के खिलाफ सख्ती करनी ही चाहिए। देश की सुरक्षा, संसाधनों और नागरिकों के अधिकारों से कोई समझौता नहीं हो सकता। मगर धार्मिक उत्पीड़न से भागकर आए वास्तविक शरणार्थी और अवैध तरीके से भारत में प्रवेश करने वाले व्यक्ति के बीच फर्क करना भी उतना ही जरूरी है। कानून इसी अंतर को पहचानकर अपना रास्ता तय करे।
पीलीभीत के इन परिवारों की कहानी हमें यही बताती है कि नागरिकता केवल पहचान पत्र नहीं है। नागरिकता का मतलब है सम्मान, अधिकार और यह भरोसा कि जिस मिट्टी को आपने अपना जीवन देकर सींचा है, उस पर आपका भी अधिकार है। अगर कोई परिवार पांच-दस नहीं, बल्कि पांच दशक से भारत में रह रहा है, यहां उसकी पीढ़ियां बड़ी हुई हैं और उसने इस देश के विकास में अपना योगदान दिया है, तो उसे अनिश्चितता में रखना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।
इसलिए ऐसे मामलों को वोटबैंक की राजनीति से ऊपर उठकर देखना चाहिए। पात्रता और कानून की कसौटी पर खरे उतरने वाले धार्मिक रूप से प्रताड़ित विस्थापितों को नागरिकता देना भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी उदारता, जिम्मेदारी और सभ्यतागत आत्मविश्वास का प्रमाण है। भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा करे, घुसपैठ पर रोक लगाए और साथ ही उन पीड़ितों के लिए आश्रय बना रहे जिनके लिए दुनिया में कोई दूसरा अपना घर नहीं बचा। यही भारत की परंपरा भी है और उसकी ताकत भी।

