अफवाह की आग में पत्रकारिता भी जल सकती है

– पूर्णेन्दु पुष्पेश

आज के दौर में खबर और अफवाह के बीच की दूरी बहुत कम हो गई है। एक वीडियो मोबाइल पर आया, किसी ने उसके साथ दो लाइन लिखीं और देखते ही देखते वह हजारों लोगों तक पहुंच गया। किसी छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई, राजनीतिक घटना या किसी संवेदनशील मामले से जुड़ी तस्वीर या वीडियो हो तो उसका असर और भी तेज होता है। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि कई बार जिस सामग्री को लोग सच मानकर आगे बढ़ाते हैं, वह पुरानी होती है, किसी दूसरे स्थान की होती है या फिर फोटो-वीडियो से छेड़छाड़ कर तैयार की गई होती है।

झारखंड पुलिस की हालिया अपील इसी खतरे को लेकर बेहद महत्वपूर्ण है। पुलिस ने साफ कहा है कि सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रही किसी भी सूचना पर बिना सत्यापन भरोसा न करें और उसे आगे शेयर भी न करें। यह अपील केवल आम लोगों के लिए नहीं, बल्कि पत्रकारों और सोशल मीडिया पर खबर चलाने वाले लोगों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि एक आम आदमी के शेयर किए गए गलत पोस्ट और किसी पत्रकार या मीडिया प्लेटफॉर्म से जारी गलत खबर के प्रभाव में बहुत बड़ा अंतर होता है।

आज फेसबुक पेज, यूट्यूब चैनल और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में ऐसे लोग सक्रिय हैं, जो खुद को पत्रकार या न्यूज चैनल के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इनमें कई लोग बिना पर्याप्त संसाधन, संपादकीय व्यवस्था और तथ्य जांच के खबरें पोस्ट कर देते हैं। कई बार उद्देश्य केवल व्यूज, लाइक और फॉलोअर बढ़ाना होता है। लेकिन खबर कोई मनोरंजन की सामग्री नहीं है। एक गलत खबर किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा खराब कर सकती है, किसी समुदाय के खिलाफ माहौल बना सकती है और किसी आंदोलन को हिंसक दिशा तक ले जा सकती है।

यहां पत्रकारों को एक बात बहुत साफ समझनी होगी—अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब अपुष्ट खबर को आगे बढ़ाने की आजादी नहीं है। पत्रकारिता का पहला धर्म ही सत्य की पुष्टि है। यदि किसी वीडियो में भीड़ दिखाई दे रही है तो यह मान लेना कि वह आज की घटना है, पत्रकारिता नहीं है। यदि किसी पोस्ट में पुलिस पर गंभीर आरोप लगाया गया है तो बिना पुलिस या संबंधित पक्ष का पक्ष जाने उसे खबर बना देना भी जिम्मेदार पत्रकारिता नहीं है।

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां गलती सुधारने की रफ्तार, गलती फैलने की रफ्तार से बहुत कम होती है। एक गलत पोस्ट दस मिनट में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है, लेकिन बाद में जारी किया गया स्पष्टीकरण शायद उतने लोगों तक कभी नहीं पहुंचे। इसलिए खबर प्रकाशित करने से पहले दस मिनट की सावधानी कई बार दस साल की प्रतिष्ठा बचा सकती है।

स्थानीय पत्रकारों की जिम्मेदारी तो और ज्यादा है। उन्हें अपने इलाके, समाज और प्रशासन की वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी होती है। इसलिए उनके द्वारा पोस्ट की गई बातों को लोग सामान्य सोशल मीडिया पोस्ट की तुलना में ज्यादा गंभीरता से लेते हैं। यदि कोई पत्रकार बिना पुष्टि के ऐसी सामग्री प्रसारित करता है जिससे तनाव, हिंसा या कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होती है, तो बाद में यह कह देना कि “हमने तो सिर्फ पोस्ट शेयर किया था” जिम्मेदारी से बचने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

इसलिए झारखंड के पत्रकारों को भी पुलिस की इस अपील को चेतावनी के बजाय पत्रकारिता के लिए जरूरी सावधानी के रूप में देखना चाहिए। खबर पहले सत्यापित हो, फिर प्रकाशित हो। फोटो और वीडियो का स्रोत जांचा जाए, घटना का स्थान और समय सुनिश्चित किया जाए और जहां संभव हो संबंधित पक्ष का बयान लिया जाए। संदेह हो तो खबर रोक देना बेहतर है, गलत खबर चला देना नहीं।

जनता को भी समझना होगा कि हर वायरल चीज खबर नहीं होती। और पत्रकारों को याद रखना होगा कि खबर की सबसे बड़ी ताकत उसकी तेजी नहीं, उसकी विश्वसनीयता है। अफवाह फैलाने वाला व्यक्ति शायद कुछ घंटे के लिए लोकप्रिय हो जाए, लेकिन जिम्मेदार पत्रकार वही है जिस पर संकट की घड़ी में समाज और प्रशासन दोनों भरोसा कर सकें। यही पत्रकारिता की असली प्रतिष्ठा है और यही लोकतंत्र की सुरक्षा भी।