– Purnendu Pusshpesh
नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन हुआ। दुनिया के कई बड़े उभरते देशों के नेता भारत आए। दो-चार घंटे की बैठक करके चले नहीं गए, बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था, आतंकवाद, ऊर्जा, स्वास्थ्य, तकनीक और बदलती वैश्विक व्यवस्था जैसे मुद्दों पर लंबी बातचीत हुई। भारत ने मेजबान देश के रूप में अपनी बात रखी और कई मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच सहमति भी बनी। लेकिन इतने बड़े आयोजन के बाद देश में चर्चा किस बात की हो रही है? डिनर में क्या परोसा गया, इस पर।
राहुल गांधी ने कहा कि 80 प्रतिशत भारतीय मांसाहारी हैं और भारतीय मांसाहारी खाना स्वादिष्ट होता है। यहां सवाल यह बिल्कुल नहीं है कि मांस खाना सही है या शाकाहारी खाना। यह हर व्यक्ति की अपनी पसंद है। भारत में दोनों तरह की खान-पान की परंपराएं हैं और दोनों का अपना स्थान है। सवाल यह है कि ब्रिक्स जैसा बड़ा अंतरराष्ट्रीय आयोजन खत्म होने के बाद हमारी राजनीतिक बहस आखिर किस मुद्दे पर हो रही है।
ब्रिक्स कोई भाजपा का सम्मेलन नहीं था। यह भारत की मेजबानी में हुआ अंतरराष्ट्रीय आयोजन था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, लेकिन वहां वे भारत के प्रधानमंत्री के रूप में गए थे। दुनिया के नेताओं के सामने भारत की बात रखी गई। इसलिए वहां भारत की विदेश नीति, भारत की आर्थिक ताकत और दुनिया में भारत की बढ़ती भूमिका की चर्चा होनी चाहिए।
विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है। सरकार ने क्या किया, क्या नहीं किया, किस समझौते का भारत को कितना फायदा होगा, कौन-सी घोषणा जमीन पर उतरेगी और कौन-सी केवल कागज पर रह जाएगी—इन सवालों पर विपक्ष सरकार को घेर सकता है और घेरना भी चाहिए। लेकिन अगर बहस इस बात पर सिमट जाए कि डिनर में चिकन-मटन क्यों नहीं था, तो क्या हम असली मुद्दे से भटक नहीं जाते?
राहुल गांधी ने 80 प्रतिशत भारतीयों के मांसाहारी होने की बात कही। लेकिन ऐसे आंकड़े को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि आंकड़ा किस सर्वे का है, किस उम्र के लोगों का है और मांसाहारी की परिभाषा क्या रखी गई है। कभी-कभार अंडा या मछली खाने वाला व्यक्ति भी इसमें गिना जाएगा या रोज मांस खाने वाला ही? इसलिए किसी एक आंकड़े को पूरे देश का अंतिम सच मान लेना ठीक नहीं है।
और मान भी लें कि देश में बड़ी संख्या में लोग मांसाहारी हैं, तो फिर इससे ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता या असफलता का क्या संबंध है? क्या भारत की विदेश नीति का फैसला खाने की प्लेट देखकर होगा? क्या आतंकवाद के खिलाफ बनी सहमति, आर्थिक सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक और ग्लोबल साउथ की भूमिका से ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि मेहमानों की प्लेट में मांस था या नहीं?
ब्रिक्स के रात्रिभोज में शाकाहारी भोजन परोसा गया। इसमें खांडवी, पनीर, मशरूम, बाजरा पुलाव, भारतीय रोटियां, जलेबी और फिरनी जैसे व्यंजन थे। यह भी भारत की ही खाद्य परंपरा है। भारत दुनिया को केवल चिकन और मटन से नहीं पहचानाता। हमारी थाली में दाल भी है, बाजरा भी है, पनीर भी है और सैकड़ों तरह के क्षेत्रीय व्यंजन भी हैं। इसलिए शाकाहारी भोजन को किसी एक विचारधारा से जोड़ देना भी उचित नहीं लगता।
यहां एक और बात समझने की जरूरत है। विपक्ष सरकार की आलोचना करे, यह लोकतंत्र की जरूरत है। सरकार की विदेश नीति में कमी है तो बताइए। ब्रिक्स में भारत को क्या मिला और क्या नहीं मिला, पूछिए। दूसरे देशों के साथ हुए समझौतों का हिसाब मांगिए। लेकिन जब दुनिया भारत को देख रही हो, तब हर बात को घरेलू राजनीति की लड़ाई में बदल देना क्या सही रणनीति है?
भारत की कोई उपलब्धि केवल इसलिए छोटी नहीं हो जाती कि उसे हासिल करने वाली सरकार भाजपा की है। इसी तरह सरकार की कोई गलती केवल इसलिए सही नहीं हो जाती कि वह भारत सरकार की गलती है। सरकार और देश में फर्क करना हमारी राजनीति को सीखना होगा।
आज दुनिया बदल रही है। भारत से उम्मीदें बढ़ रही हैं। ऐसे समय में सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी बढ़ती है। सरकार को अपनी विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय समझौतों का हिसाब जनता को देना चाहिए। विपक्ष को सवाल पूछने चाहिए। लेकिन विपक्ष को यह भी दिखाना चाहिए कि जब देश किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर आगे बढ़ता है तो वह उसे देश की उपलब्धि मानकर देख सकता है।
ब्रिक्स की मेज पर उस दिन क्या परोसा गया, यह कुछ घंटे की बात है। उस मेज पर भारत ने दुनिया के सामने क्या बात रखी और उससे आने वाले समय में भारत को क्या मिलेगा, असली सवाल यह है। राजनीति अपनी जगह है, भाजपा और कांग्रेस की लड़ाई अपनी जगह है, लेकिन भारत उससे बड़ा है। यही फर्क हमारी राजनीतिक बहस में दिखाई देना चाहिए।

