-पूर्णेन्दु पुष्पेश
भारत में डिजिटल भुगतान की कहानी लिखी जाए तो यूपीआई उसका सबसे बड़ा अध्याय होगा। कुछ साल पहले तक जेब में नकदी रखना जरूरी लगता था। आज चाय की दुकान से लेकर बड़े शोरूम तक मोबाइल निकालिए, क्यूआर कोड स्कैन कीजिए और भुगतान हो जाता है। यही आसान व्यवस्था यूपीआई को आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा बना चुकी है। दस साल में यूपीआई के सालाना लेन-देन 2016-17 के करीब दो करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 24,162 करोड़ से अधिक हो गए और लेन-देन का मूल्य करीब 314 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।
अब 15 अक्टूबर से चुनिंदा बड़े व्यापारी भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होने जा रहा है। यहां सबसे पहले भ्रम दूर करना जरूरी है। यह ग्राहक से सीधे लिया जाने वाला शुल्क नहीं है। 2,000 रुपये तक के व्यापारी भुगतान और व्यक्ति से व्यक्ति होने वाले यूपीआई लेन-देन मुफ्त रहेंगे। सरकार के अनुसार करीब 96 प्रतिशत पी2एम लेन-देन भी इस बदलाव से बाहर रहेंगे। 75,000 रुपये या उससे अधिक के पात्र लेन-देन पर शुल्क 300 रुपये तक सीमित रहेगा।
इसलिए यह कहना कि अब हर यूपीआई भुगतान पर पैसा देना पड़ेगा, गलत होगा। लेकिन दूसरी तरफ यह मान लेना भी ठीक नहीं होगा कि व्यापारी पर पड़ने वाली लागत का कोई असर ग्राहक पर कभी नहीं आएगा। व्यापारी के सामने विकल्प होंगे। वह अपने मुनाफे में से खर्च उठा सकता है, कारोबार की कीमत में उसे समायोजित कर सकता है या किसी दूसरे भुगतान माध्यम को बढ़ावा दे सकता है। इसलिए असली सवाल शुल्क किससे लिया जा रहा है, इससे आगे का है। सवाल यह है कि इसका असर आखिर बाजार में कहां जाकर बैठेगा।
यूपीआई को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना भी जरूरी है। इतने बड़े नेटवर्क को चलाने के लिए बैंकिंग व्यवस्था, सर्वर, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने की तकनीक और लगातार बढ़ती डिजिटल जरूरतों पर खर्च होता है। सरकार ने भी एमडीआर व्यवस्था को यूपीआई की दीर्घकालिक स्थिरता, सुरक्षा और तकनीकी विकास से जोड़ा है। एमडीआर से मिलने वाली राशि सरकार का कर राजस्व नहीं है, बल्कि भुगतान व्यवस्था से जुड़े हिस्सेदारों के बीच वितरित होनी है।
लेकिन यहां एक बुनियादी बात नहीं भूलनी चाहिए। यूपीआई की सफलता सिर्फ तकनीक की सफलता नहीं है। यह भरोसे की सफलता है। लोगों ने इसे इसलिए अपनाया क्योंकि भुगतान आसान था, तेज था और रोजमर्रा के छोटे कारोबार में अतिरिक्त शुल्क की चिंता नहीं थी। अगर धीरे-धीरे दुकानदार और ग्राहक दोनों को यह लगने लगे कि डिजिटल भुगतान का मतलब अतिरिक्त लागत है, तो इसका असर केवल भुगतान प्रणाली पर नहीं पड़ेगा। नकदी की वापसी, भुगतान माध्यम बदलने और छोटे कारोबारियों की लागत बढ़ने जैसी स्थितियां भी सामने आ सकती हैं।
खासकर छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों को लेकर सावधानी जरूरी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि छोटे व्यापारियों के लिए शून्य एमडीआर की व्यवस्था जारी रहेगी और एक लाख रुपये तक की मासिक यूपीआई प्राप्ति वाले छोटे व्यापारी इस सुरक्षा दायरे में रहेंगे। साथ ही एमडीआर संग्रह का एक हिस्सा छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए कोष में जाएगा।
भारत के नागरिक के नजरिए से सबसे जरूरी बात पारदर्शिता है। अगर शुल्क लिया जा रहा है तो यह साफ होना चाहिए कि किस लेन-देन पर कितना शुल्क लगेगा, कौन देगा और उस पैसे का इस्तेमाल किस तरह होगा। व्यापारी के लिए भी नियम स्पष्ट होने चाहिए और ग्राहक के लिए भी। सबसे महत्वपूर्ण यह कि एमडीआर को ग्राहक से अलग नाम देकर वसूलने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। सरकार ने बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि व्यापारी एमडीआर का बोझ ग्राहक पर न डालें।
भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था अब इतनी बड़ी हो चुकी है कि यूपीआई में किया गया कोई भी बदलाव केवल बैंकिंग उद्योग का मामला नहीं रह गया है। यह दुकानदार, ग्राहक, बैंक, भुगतान कंपनियों और पूरे बाजार को प्रभावित करता है। इसलिए यूपीआई से कमाई का मॉडल बनाना गलत नहीं है, लेकिन उसकी सीमा और उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए।
यूपीआई को मुफ्त रखने का मतलब यह नहीं कि इसकी लागत कभी नहीं आएगी। लेकिन इसकी लागत का समाधान ऐसा होना चाहिए जिससे डिजिटल भुगतान की आदत और भरोसा दोनों सुरक्षित रहें। आज भारत के सामने मौका है कि वह दुनिया को सिर्फ यह न बताए कि बड़े पैमाने पर डिजिटल भुगतान कैसे किया जाता है, बल्कि यह भी दिखाए कि ऐसी व्यवस्था को लंबे समय तक आम आदमी के लिए सस्ता और भरोसेमंद कैसे रखा जाता है।
आखिर यूपीआई की सबसे बड़ी उपलब्धि 314 लाख करोड़ रुपये का लेन-देन नहीं है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने भारत के करोड़ों लोगों को डिजिटल भुगतान पर भरोसा करना सिखाया है। इस भरोसे को बनाए रखना किसी भी शुल्क से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यूपीआई को टिकाऊ बनाइए, सुरक्षित बनाइए, तकनीकी रूप से और मजबूत बनाइए, लेकिन यह ध्यान रहे कि उसकी मजबूती की कीमत वही आम नागरिक न चुकाने लगे, जिसने इस व्यवस्था को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में जगह दी है। डिजिटल भारत की असली सफलता यही होगी कि तकनीक आगे बढ़े और नागरिक की सुविधा भी साथ-साथ बढ़े।

