– पूर्णेन्दु पुष्पेश
मैं कलाकार हूं। इसलिए जब कोई मुझसे पूछता है कि झारखंड में कलाकारों के लिए क्या हो रहा है, तो मेरे पास कहने को बहुत कुछ है और शिकायत करने को भी। लेकिन सच कहूं तो हमारी सबसे बड़ी परेशानी मंच की कमी नहीं है। परेशानी यह है कि मंच तक पहुंचने से पहले हम अक्सर किसी न किसी फाइल में अटक जाते हैं। और उस फाइल की स्थिति होती है—‘अंडर प्रोसेस’। यह दो शब्द कलाकार के लिए बहुत भारी हैं।
झारखंड सरकार ने हाल के वर्षों में कला-संस्कृति के क्षेत्र में कई अच्छी पहल की हैं। जुलाई 2026 की विभागीय समीक्षा में बताया गया कि राज्य में करीब 12 हजार कलाकारों का निबंधन हो चुका है। सरकार ने इन कलाकारों का जिलों के स्तर पर सत्यापन कराने और उन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अवसरों से जोड़ने की बात भी कही है। यह निश्चित रूप से उम्मीद जगाने वाली बात है। लेकिन कलाकार के मन में अगला सवाल तुरंत आता है—पंजीकरण के बाद क्या? हमारा नाम सरकारी सूची में आ गया, ठीक है। लेकिन उससे घर कैसे चलेगा?
कलाकार के लिए पहचान जरूरी है, पर पहचान के साथ काम भी जरूरी है। काम के साथ समय पर भुगतान जरूरी है। और भुगतान के साथ यह भरोसा भी जरूरी है कि अगली बार अवसर पाने के लिए उसे फिर किसी दफ्तर की सीढ़ी नहीं चढ़नी पड़ेगी।
सरकार ने इसी समस्या को समझते हुए Cultural Troupe Management System यानी CTMS शुरू किया है। इसका उद्देश्य सांस्कृतिक दलों के पंजीकरण से लेकर कार्यक्रम, चयन, फीडबैक और भुगतान की प्रक्रिया को ऑनलाइन और ज्यादा पारदर्शी बनाना है। सरकारी दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि इससे कागजी प्रक्रिया कम होगी, समान अवसर मिलेगा और भुगतान तेजी से किया जा सकेगा।
अब जरूरत सिर्फ इतनी है कि इस व्यवस्था की आत्मा भी वही रहे, जो उसके कागज पर लिखी गई है। क्योंकि डिजिटल व्यवस्था तभी कलाकार के काम की है, जब कलाकार को अपने आवेदन की स्थिति पता चले। अगर स्क्रीन पर महीनों तक सिर्फ ‘अंडर प्रोसेस’ लिखा रहे और यह पता न चले कि मामला किस टेबल पर है, क्या कमी है और फैसला कब होगा, तो ऑनलाइन व्यवस्था भी पुराने दफ्तर का ही नया रूप बन जाती है।
कलाकार कोई सरकारी फाइल नहीं है। उसके पीछे परिवार है, खर्च है, बीमारी है, बच्चों की पढ़ाई है और सबसे बढ़कर वर्षों की साधना है।
यहां सरकार की दूसरी पहल भी महत्वपूर्ण है। सांस्कृतिक कार्य निदेशालय ने वृद्ध, गंभीर रूप से अस्वस्थ और स्थायी रूप से दिव्यांग कलाकारों के लिए मासिक निवृत्तिका योजना शुरू की है। विभाग की वेबसाइट पर कलाकारों के लिए मासिक पारिश्रमिक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से संबंधित सूचनाएं भी उपलब्ध हैं। यह जरूरी कदम है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि कलाकार सिर्फ बूढ़ा होने के बाद कलाकार नहीं बनता। आज का युवा कलाकार भी आज ही संघर्ष कर रहा है। उसके लिए क्या है?
झारखंड में लोकगीत है, लोकनृत्य है, छऊ है, पाइका है, सोहराय और कोहवर है, जादोपटिया और पाइटकर जैसी चित्र परंपराएं हैं, लोकवाद्य हैं, रंगमंच है। सरकार की अपनी सांस्कृतिक वेबसाइट भी इन विधाओं को राज्य की सांस्कृतिक पहचान के रूप में दर्ज करती है। लेकिन इन विधाओं को बचाने का मतलब सिर्फ साल में एक-दो महोत्सव आयोजित कर लेना नहीं है। इन विधाओं को बचाने का मतलब है—इनके कलाकारों को बचाना। कलाकार को लगातार काम मिलेगा तो कला बचेगी। कलाकार को सम्मानजनक पारिश्रमिक मिलेगा तो अगली पीढ़ी इस पेशे में आएगी। कलाकार को बाजार मिलेगा तो उसकी कला घर की चारदीवारी से निकलकर देश-दुनिया तक पहुंचेगी।
यहीं पर्यटन को कला से जोड़ने की बड़ी संभावना है। झारखंड आने वाला पर्यटक सिर्फ पहाड़, झरना या मंदिर देखने नहीं आता। वह यहां की संस्कृति भी देखना चाहता है। पर्यटन स्थलों पर नियमित लोक प्रस्तुतियां हों, स्थानीय कलाकारों के लिए प्रदर्शन और बिक्री के स्थायी मंच बनें, हस्तशिल्प और लोककला को बाजार मिले—तो संस्कृति रोजगार का जरिया भी बन सकती है।
राज्य में साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं की दिशा में भी कदम उठे हैं। संस्कृति विभाग की वेबसाइट पर इन अकादमियों के गठन से जुड़े मसौदे और सूचनाएं उपलब्ध हैं। अब इन संस्थाओं से कलाकारों को सिर्फ पुरस्कार की उम्मीद नहीं, बल्कि मार्गदर्शन, प्रशिक्षण, शोध, दस्तावेजीकरण और राष्ट्रीय मंच तक पहुंच की उम्मीद है।
और सबसे जरूरी है—जवाबदेही। अगर किसी कलाकार का आवेदन लंबित है तो उसे बताया जाए कि क्यों। सत्यापन बाकी है तो उसकी समयसीमा तय हो। चयन हो गया है तो भुगतान की तारीख बताई जाए। आवेदन खारिज हुआ है तो कारण बताया जाए। कलाकार को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उसका मामला किस स्तर पर है।
सरकार ने करीब 12 हजार कलाकारों का डेटाबेस बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। अब इस डेटाबेस को सिर्फ नाम और मोबाइल नंबरों की सूची न बनाया जाए। इसमें कलाकार की विधा, अनुभव, उपलब्धियां, प्रशिक्षण की जरूरत, प्रस्तुति के अवसर और भुगतान का रिकॉर्ड भी जुड़ना चाहिए। तब सरकार के पास सिर्फ कलाकारों की संख्या नहीं, बल्कि झारखंड की पूरी सांस्कृतिक ताकत का वास्तविक नक्शा होगा।
मैं फिर उसी सवाल पर लौटता हूं—‘अंडर प्रोसेस’ आखिर कब तक? फाइल का अंडर प्रोसेस होना सामान्य बात हो सकती है। कलाकार का भविष्य अंडर प्रोसेस रहना सामान्य नहीं हो सकता। हमने पीढ़ियों से झारखंड की संस्कृति को संभाला है। अब सरकार, समाज और बाजार की जिम्मेदारी है कि कलाकार को संभालें। हमें सिर्फ मंच पर बुलाकर ताली नहीं चाहिए। हमें काम चाहिए, उचित पारिश्रमिक चाहिए, पारदर्शी व्यवस्था चाहिए और यह भरोसा चाहिए कि हमारी मेहनत किसी फाइल में खो नहीं जाएगी।
झारखंड की संस्कृति को बचाने की बात बहुत होती है। अब समय है कि हम एक सीधा सवाल पूछें -जिस कलाकार के कंधे पर यह संस्कृति टिकी है, उसका भविष्य आखिर किस फाइल में अटका है? पहचान के साथ काम भी जरूरी है। वह काम कहाँ है ? अगर कुछ को जो काम मिल भी गया तो काम के साथ समय पर भुगतान कहाँ है ?
और अगर जवाब फिर वही आया—‘अंडर प्रोसेस’—तो समझना होगा कि समस्या कलाकार में नहीं, व्यवस्था की प्रक्रिया में है।

