– पूर्णेन्दु पुष्पेश
कभी भारत की चर्चा होती थी तो दो बातें सबसे पहले सामने आती थीं- ‘बड़ी आबादी और बड़ा बाजार’। यानी दुनिया के लिए भारत एक ऐसा देश था जहां बहुत सारे ग्राहक हैं। लेकिन तस्वीर अब बदल रही है। भारत धीरे-धीरे उस देश में बदल रहा है जहां दुनिया सिर्फ अपना सामान बेचने नहीं, बल्कि बनाने, शोध करने, तकनीक विकसित करने और अपना कारोबार चलाने भी आ रही है। यही बदलाव भारत की नई औद्योगिक कहानी है।
आंकड़े इसकी तस्वीर साफ करते हैं। देश में डेटा सेंटर की क्षमता 2020 में करीब 375 मेगावाट थी, जो 2025 तक लगभग 1,500 मेगावाट पहुंच गई। इसका मतलब है कि भारत केवल डिजिटल सेवाओं का बड़ा उपभोक्ता नहीं, बल्कि दुनिया के डिजिटल कारोबार के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा भी तैयार कर रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड और डिजिटल सेवाओं की बढ़ती जरूरत इस बदलाव को और तेज कर रही है।
ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर यानी GCC इस बदलाव की दूसरी बड़ी कहानी हैं। भारत में ऐसे 1,700 से ज्यादा केंद्र काम कर रहे हैं और इनमें 19 लाख से अधिक पेशेवर जुड़े हैं। यहां अब केवल बैक ऑफिस का काम नहीं होता। उत्पाद विकास, साइबर सुरक्षा, इंजीनियरिंग, डेटा एनालिटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे काम भी भारत से हो रहे हैं। सीधी बात है—दुनिया की कंपनियां भारत में केवल काम करवाने नहीं, अपनी अगली तकनीक तैयार करने भी आ रही हैं।
सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भी यही बदलाव दिखाई देता है। अप्रैल 2026 तक भारत में करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये के निवेश वाली 10 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी थी। दूसरी ओर, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 2014-15 के करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में लगभग 12 लाख करोड़ रुपये हो गया। मोबाइल फोन का निर्यात भी करीब 1,500 करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत असेंबली से आगे बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक्स की पूरी आपूर्ति श्रृंखला में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।
अंतरिक्ष क्षेत्र भी बदल रहा है। कभी यह लगभग पूरी तरह सरकारी क्षेत्र था। अब भारत में 450 से ज्यादा अंतरिक्ष स्टार्टअप काम कर रहे हैं। लॉन्च व्हीकल से लेकर सैटेलाइट और अंतरिक्ष आधारित सेवाओं तक निजी कंपनियां आगे आ रही हैं। इसी तरह सौर ऊर्जा में भी क्षमता लगातार बढ़ रही है। जुलाई 2026 तक देश की स्थापित सौर क्षमता करीब 164.59 गीगावाट पहुंच चुकी थी। यानी आने वाले उद्योगों के लिए ऊर्जा और तकनीक—दोनों मोर्चों पर भारत अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।
लेकिन इन आंकड़ों से उत्साहित होने के साथ एक सवाल पूछना भी जरूरी है। निवेश कितना आया, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे भारत को मिला क्या, यह उससे भी महत्वपूर्ण है। कितने रोजगार बने? कितनी तकनीक देश में आई? कितने भारतीय छोटे-बड़े उद्योग इस सप्लाई चेन से जुड़े? कितनी भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार में मजबूत हुईं? अगर इन सवालों के जवाब सकारात्मक हैं, तभी निवेश का असली लाभ दिखाई देगा।
भारत की अगली चुनौती अपनी प्रतिभा को अवसर देना है। जिस देश के युवा कभी बेहतर अवसरों के लिए विदेश जाते थे, उसी देश में अब दुनिया की कंपनियां अवसर लेकर आ रही हैं। यह बदलाव तभी टिकेगा जब भारत में शोध, उद्यम, अच्छे रोजगार और वैश्विक स्तर के करियर लगातार बढ़ें।
भारत के पास बाजार पहले से था। अब उसके साथ प्रतिभा, डिजिटल क्षमता, उत्पादन और तकनीक जुड़ रही है। इसलिए भारत के सामने चुनौती सिर्फ दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की नहीं है। असली मौका इससे बड़ा है -दुनिया के लिए काम करने वाला, सोचने वाला और नई तकनीक बनाने वाला देश बनने का। आने वाले वर्षों में भारत की पहचान इस बात से तय होगी कि दुनिया भारत में कितना बेचती है, उससे ज्यादा इस बात से कि भारत दुनिया के लिए कितना नया बनाता है।

