– Purnendu Pusshpesh
किसी सरकार को हटाना है, तो जनता का भरोसा जीतिए। चुनाव लड़िए और बहुमत हासिल कीजिए। लोकतंत्र का रास्ता यही है। लेकिन जब कोई समूह ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता-व्यवस्था बदलने की बात करता है, तो सवाल उठता है कि आखिर वह ऐसा करना कैसे चाहता है? क्या उसे लगता है कि कुछ दिनों तक प्रदर्शन करने, सोशल मीडिया पर अभियान चलाने और सरकार के खिलाफ माहौल बनाने से देश की सत्ता बदल जाएगी? भारत जैसे लोकतंत्र में ऐसा सोचना जनता की ताकत और चुनाव की अहमियत को कम करके आंकना है।
दुनिया के कई देशों में सत्ता परिवर्तन हिंसा, सैन्य हस्तक्षेप या तानाशाही के खिलाफ बड़े जनांदोलनों के जरिए हुआ है। लेकिन भारत की स्थिति अलग है। यहां सरकार बदलने के लिए चुनाव होते हैं और जनता को हर कुछ वर्षों में अपना फैसला सुनाने का मौका मिलता है। अगर किसी दल को लगता है कि मौजूदा सरकार गलत काम कर रही है, तो वह जनता के बीच जाए, अपनी बात रखे और बेहतर विकल्प पेश करे। जनता को उसका विकल्प पसंद आया, तो सत्ता बदल जाएगी। इसके लिए किसी कथित क्रांति या अराजकता की जरूरत नहीं है।
यही बात ‘रिजीम चेंज’ का दावा करने वालों को समझनी चाहिए। राजधानी के किसी छोटे से इलाके में प्रदर्शन कर लेने या सोशल मीडिया पर हजारों पोस्ट डाल देने से यह साबित नहीं होता कि पूरा देश उनके साथ है। देश की जनता क्या सोचती है, इसका पता चुनाव में चलता है, इंटरनेट पर चलने वाले अभियानों से नहीं। अगर किसी आंदोलन को लगता है कि उसके पास जनता का समर्थन है, तो उसे अपनी मांगों और विचारों को देश के सामने रखना चाहिए। आखिर जनता को यह जानने का हक है कि वह किस बदलाव की बात कर रहा है और उस बदलाव से आम लोगों की जिंदगी कैसे बेहतर होगी।
भारत में राष्ट्रवाद की ताकत इसी बात में है कि देश का फैसला देश की जनता करती है। यहां राष्ट्रवाद का मतलब यह नहीं कि सरकार की हर बात सही मान ली जाए। सरकार गलत है, तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। विपक्ष को सवाल पूछने चाहिए और जनता को अपनी नाराजगी जाहिर करने का पूरा अधिकार होना चाहिए। लेकिन सरकार का विरोध करना और पूरी व्यवस्था को अस्थिर करने की कोशिश करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। सरकार बदल सकती है, लेकिन देश की संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करके बदलाव लाने की कोशिश किसी भी तरह उचित नहीं कही जा सकती।
तिरंगे को लेकर भी यही बात लागू होती है। तिरंगा हाथ में ले लेने भर से कोई आंदोलन सही या गलत नहीं हो जाता। उसके सम्मान का मतलब है देश के संविधान, कानून और राष्ट्रीय एकता का सम्मान करना। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अधिकार है, लेकिन अगर कोई कानून तोड़ता है, तो उसे सिर्फ इस आधार पर कार्रवाई से छूट नहीं मिल सकती कि उसके हाथ में तिरंगा था। दूसरी तरफ, पुलिस और जांच एजेंसियों को भी कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए। किसी के खिलाफ आरोप लगने का मतलब यह नहीं कि वह दोषी साबित हो गया। फैसला तथ्यों और निष्पक्ष जांच के आधार पर होना चाहिए।
अगर किसी आंदोलन के पीछे पैसा कहां से आ रहा है या किन संगठनों का समर्थन है, इस पर सवाल उठते हैं, तो जांच होनी चाहिए। लेकिन बिना सबूत किसी को देशविरोधी कहना भी ठीक नहीं है। लोकतंत्र में न सरकार को मनमानी की छूट है और न आंदोलनकारियों को कानून से ऊपर रहने का अधिकार। आज जरूरत ऐसे राष्ट्रवाद की है, जो युवाओं को देश की समस्याओं के समाधान से जोड़े। रोजगार कैसे बढ़ेगा, शिक्षा बेहतर कैसे होगी, महंगाई से राहत कैसे मिलेगी और देश विकास के रास्ते पर कैसे आगे बढ़ेगा ….इन सवालों पर बहस होनी चाहिए। जो लोग सत्ता बदलना चाहते हैं, वे जनता को अपना विकल्प बताएं। जो सत्ता में हैं, वे अपने काम का हिसाब दें। और जनता को यह तय करने दिया जाए कि उसे किस पर भरोसा है।
आखिरकार, भारत में सरकार बनाने और बदलने का अधिकार मतदाता के पास है। कोई दल हो, नेता हो या आंदोलनकारी समूह, वह इस अधिकार से ऊपर नहीं हो सकता। सरकारें आती-जाती रहेंगी, राजनीतिक विचार बदलते रहेंगे, लेकिन देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत रहनी चाहिए। यही राष्ट्रवाद की असली ताकत है—देश के संविधान पर भरोसा, जनता के फैसले का सम्मान और भारत को आगे ले जाने की साझा जिम्मेदारी।

