स्वतंत्रता और स्वच्छंदता

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश

स्वतंत्रता मनुष्य और समाज की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है। दोनों शब्द सुनने में एक जैसे लग सकते हैं, पर इनके अर्थ और सीमाएं बिल्कुल अलग हैं। स्वतंत्रता का अर्थ है अपने विचार, कर्म और जीवन के फैसले लेने का अधिकार, जबकि स्वच्छंदता का अर्थ है बिना किसी जिम्मेदारी, मर्यादा या सामाजिक दायित्व की परवाह किए अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करना। इसलिए स्वतंत्रता अधिकार देती है, तो स्वच्छंदता अधिकार के नाम पर सीमा तोड़ने की प्रवृत्ति पैदा करती है।

भारत एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक गणराज्य है। हमारे संविधान ने नागरिकों को अनेक मौलिक अधिकार दिए हैं और इनमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी महत्वपूर्ण है। कोई व्यक्ति सरकार की आलोचना कर सकता है, व्यवस्था पर सवाल उठा सकता है, किसी नीति से असहमति जता सकता है और अपनी बात सार्वजनिक रूप से रख सकता है। यही लोकतंत्र की ताकत है। यदि नागरिकों को सवाल पूछने और असहमति व्यक्त करने का अधिकार न हो तो लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की व्यवस्था बनकर रह जाएगा।

लेकिन सवाल यह है कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि व्यक्ति जो चाहे, जैसे चाहे और जिसके बारे में चाहे, कुछ भी कह दे? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से नहीं है। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी जुड़ी होती है। संविधान भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निरंकुश अधिकार नहीं मानता। सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, मानहानि, अदालत की अवमानना, अपराध के लिए उकसावे और देश की सुरक्षा जैसे विषयों पर कानून के तहत उचित सीमाएं निर्धारित हैं। इसका उद्देश्य नागरिक की आवाज दबाना नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और सामाजिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना है।

इसे एक सामान्य उदाहरण से समझा जा सकता है। किसी व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह किसी जनप्रतिनिधि के कामकाज की आलोचना करे। वह कह सकता है कि सड़क खराब है, प्रशासन ने काम नहीं किया या सरकार की नीति गलत है। यह स्वतंत्रता है। लेकिन यदि वह बिना प्रमाण किसी व्यक्ति पर गंभीर अपराध का आरोप लगाने लगे, झूठी सूचना फैलाए या किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने वाली बात करे तो यह स्वतंत्रता नहीं, स्वच्छंदता की ओर बढ़ता कदम है।

सोशल मीडिया ने इस अंतर को और महत्वपूर्ण बना दिया है। आज हर व्यक्ति के हाथ में सूचना और अभिव्यक्ति का माध्यम है। एक पोस्ट कुछ सेकंड में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है। ऐसे में बिना सत्यापन के किसी खबर को साझा करना, अफवाह फैलाना या किसी की निजी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री प्रसारित करना केवल इसलिए उचित नहीं हो जाता कि वह व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहा है। स्वतंत्र नागरिक वही है जो बोलने से पहले यह भी सोचता है कि उसकी बात का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

हमें यह भी समझना होगा कि स्वतंत्रता केवल अधिकार का नाम नहीं, उत्तरदायित्व का भी नाम है। सड़क पर वाहन चलाने की स्वतंत्रता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई लाल बत्ती तोड़कर या दूसरों की जान खतरे में डालकर वाहन चलाए। व्यापार करने की स्वतंत्रता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कोई मिलावट करे। उसी तरह बोलने की स्वतंत्रता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कानून, सामाजिक मर्यादा और दूसरे व्यक्ति के अधिकारों को कुचल दिया जाए।

भारत में हम स्वतंत्र हैं, स्वच्छंद नहीं। हमारी स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान से सुरक्षित है, जबकि उसकी मर्यादा कानून और नागरिक जिम्मेदारी से तय होती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की शेरनी है, लेकिन उसे स्वच्छंदता की सीमा में पहुंचने देना लोकतंत्र को ही कमजोर कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी आवाज को दबाएं नहीं, बल्कि उसे जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करें। क्योंकि सच्ची स्वतंत्रता वही है जिसमें अपने अधिकार के साथ दूसरे के अधिकार का भी सम्मान किया जाए।