Editorial by Purnendu Pusshpesh
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले झारखंड और बिहार के लाखों युवाओं के लिए परीक्षा सिर्फ परीक्षा नहीं होती। इसके पीछे कई साल की मेहनत, परिवार की उम्मीद और नौकरी पाने का सपना जुड़ा होता है। ऐसे में जब फॉर्म भरने के समय सवाल आता है कि ईडब्ल्यूएस से आवेदन करें या अनारक्षित से, तो यह सामान्य विकल्प नहीं रह जाता। अभ्यर्थी के मन में सीधा सवाल होता है—अगर मेरे अंक अनारक्षित कटऑफ से ज्यादा हैं, तो क्या मुझे खुली मेरिट में जगह मिलेगी?
यही सवाल अब झारखंड और बिहार में भी गंभीर चर्चा का विषय बनना चाहिए। खासकर उन युवाओं के लिए, जो जेपीएससी, जेएसएससी, बीपीएससी और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश पीसीएस के वर्षों के आंकड़ों ने जिस विसंगति को सामने रखा है, वह दूसरे राज्यों के लिए भी चेतावनी है। अगर किसी आरक्षित श्रेणी का अभ्यर्थी सामान्य कटऑफ से ज्यादा अंक लाता है और फिर भी उसे सिर्फ उसकी श्रेणी के आधार पर सामान्य मेरिट में जगह नहीं मिलती, तो सवाल व्यवस्था की पारदर्शिता पर उठना स्वाभाविक है।
बात को बिल्कुल सरल तरीके से समझिए। ‘अनारक्षित’ का मतलब किसी जाति या आर्थिक वर्ग से नहीं है। इसका मतलब है खुली प्रतियोगिता। यानी जिस अभ्यर्थी के अंक मेरिट में आते हैं, वह उस अवसर का हकदार होना चाहिए। आरक्षण का मकसद उन वर्गों को अतिरिक्त सहारा देना है, जिन्हें ऐतिहासिक या सामाजिक कारणों से बराबरी का अवसर नहीं मिला। लेकिन आरक्षण का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि आरक्षित वर्ग का कोई मेधावी अभ्यर्थी खुली मेरिट में आने के बावजूद अपनी श्रेणी तक सीमित कर दिया जाए।
ईडब्ल्यूएस के मामले में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। ईडब्ल्यूएस की पहचान आर्थिक आधार पर होती है। परीक्षा की उत्तर पुस्तिका यह नहीं देखती कि विद्यार्थी के घर की आमदनी कितनी है। वह सिर्फ उसके ज्ञान और प्रदर्शन को देखती है। फिर अगर कोई ईडब्ल्यूएस अभ्यर्थी सामान्य कटऑफ से अधिक अंक हासिल करता है, तो उसकी आर्थिक श्रेणी उसकी प्रतिभा के रास्ते में क्यों आए?
बिहार और झारखंड के युवाओं की परेशानी इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यहां सरकारी नौकरी की प्रतियोगिता बेहद कड़ी है। एक-एक पद के लिए हजारों उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं। प्रारंभिक परीक्षा में कुछ अंकों का अंतर ही तय करता है कि अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा तक पहुंचेगा या नहीं। इसलिए यह कहना कि अंतिम चयन में तो मेरिट का ध्यान रखा जाएगा, पर्याप्त जवाब नहीं है। अगर किसी को प्रारंभिक परीक्षा में ही बाहर कर दिया गया, तो अंतिम मेरिट तक पहुंचने का मौका ही कहां बचा?
यहां एक और बात साफ होनी चाहिए। आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना समाधान नहीं है। आरक्षण की जरूरत और उसका संवैधानिक महत्व अपनी जगह है। असली सवाल उसके सही और न्यायपूर्ण संचालन का है। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें वंचित को अवसर मिले और मेहनत से आगे निकलने वाले को उसकी योग्यता का पूरा सम्मान भी मिले।
झारखंड और बिहार की सरकारों, भर्ती आयोगों और संबंधित विभागों को इस मुद्दे पर स्पष्ट नियम बनाने चाहिए। आवेदन से लेकर प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और अंतिम चयन तक यह साफ होना चाहिए कि आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी किस स्थिति में खुली मेरिट में आएगा। नियम जितने स्पष्ट होंगे, विवाद उतने ही कम होंगे।
आखिरकार प्रतियोगी परीक्षा में अभ्यर्थी को सिर्फ परीक्षा नहीं देनी होती, उसे व्यवस्था पर भरोसा भी करना होता है। यह भरोसा तभी बनेगा जब उसे लगे कि उसका मूल्यांकन उसकी जाति, आर्थिक स्थिति या आवेदन में चुनी गई श्रेणी से नहीं, बल्कि उसकी योग्यता और प्रदर्शन से होगा। आरक्षण कमजोर को सहारा दे, लेकिन किसी मेधावी युवा के लिए अवसर की छत न बन जाए। यही न्यायपूर्ण व्यवस्था की पहचान है और यही बिहार-झारखंड के मेहनती युवाओं की सबसे जायज उम्मीद भी।

