शिक्षक जागेगा, तभी पीढ़ी संस्कारित होगी

– पूर्णेन्दु पुष्पेश

बीते दिनों देश में जेन-जी यानी नई पीढ़ी के आंदोलन और उनके कई रूप देखने को मिले। कहीं युवाओं का गुस्सा लोकतांत्रिक तरीके से सामने आया, तो कहीं कुछ तस्वीरों और वीडियो में ऐसी भाषा, ऐसा व्यवहार और ऐसी अशालीनता दिखाई दी, जिसे देखकर सहज ही सवाल उठता है कि आखिर हमारी नई पीढ़ी किस दिशा में जा रही है। लेकिन यहां पूरी जेन-जी को दोषी ठहराना ठीक नहीं होगा। देश के करोड़ों युवा आज भी मेहनती, संवेदनशील, संस्कारी और जिम्मेदार हैं। समस्या उन कुछ चेहरों की है, जिनके व्यवहार में गुस्से के साथ मर्यादा भी टूटती दिखाई देती है। सवाल यह है कि आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी है?

किसी बच्चे के संस्कार की पहली पाठशाला उसका परिवार होता है और दूसरी पाठशाला विद्यालय। परिवार बच्चे को जीवन जीने का तरीका सिखाता है और शिक्षक उसके व्यक्तित्व को दिशा देता है। इसलिए शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों को फूल देने और शुभकामनाएं देने का दिन नहीं होना चाहिए। यह दिन हमें यह सोचने का मौका देता है कि हमारे शिक्षक आने वाली पीढ़ी को केवल परीक्षा पास करने के लिए तैयार कर रहे हैं या जीवन की परीक्षा के लिए भी।

आज शिक्षा का मतलब बहुत हद तक नौकरी, अच्छा पैकेज और ऊंचा पद हासिल करना बन गया है। इसमें कोई बुराई नहीं है। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़-लिखकर सफल हो। लेकिन सफलता का मतलब केवल अच्छी नौकरी और बड़ा वेतन हो जाए तो फिर हम एक जरूरी बात भूल जाते हैं—अच्छा इंसान बनना। जिस शिक्षा से ज्ञान तो मिले, लेकिन विवेक न आए; डिग्री तो मिले, लेकिन जिम्मेदारी का भाव न आए; नौकरी तो मिले, लेकिन माता-पिता, समाज और देश के प्रति सम्मान न आए, उस शिक्षा पर हमें ठहरकर विचार करना ही होगा।

भारत की शिक्षा परंपरा में गुरु का स्थान इसलिए बड़ा था क्योंकि गुरु केवल किताब नहीं पढ़ाता था, वह जीवन पढ़ाता था। वह विद्यार्थी को बताता था कि सही और गलत में अंतर क्या है, गुस्से पर नियंत्रण कैसे रखा जाए, दूसरे का सम्मान क्यों किया जाए और अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्य को भी क्यों समझना चाहिए। आज के दौर में यह भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। बच्चे के हाथ में किताब के साथ मोबाइल है, इंटरनेट है, सोशल मीडिया है और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी है। वह कुछ भी जान सकता है, लेकिन सही क्या है और गलत क्या है, यह समझाने वाला कौन है? यही काम शिक्षक को करना है।

आज शिक्षक के सामने चुनौती केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की नहीं है। उसे एक ऐसे बच्चे के साथ काम करना है, जिसकी दुनिया विद्यालय की चारदीवारी से बहुत बड़ी हो चुकी है। इंटरनेट उसे हर तरह की जानकारी दे रहा है। सोशल मीडिया उसे हर तरह का कंटेंट दिखा रहा है। ऐसे में शिक्षक को जानकारी देने वाले व्यक्ति से आगे बढ़कर मार्गदर्शक बनना होगा। उसे बच्चे को यह समझाना होगा कि हर वायरल वीडियो सच नहीं होता, हर लोकप्रिय बात सही नहीं होती और हर आजादी का मतलब मनमानी नहीं होता।

लेकिन इसके लिए शिक्षक को भी बदलना होगा। शिक्षक का अपना आचरण ही विद्यार्थी की सबसे बड़ी किताब होता है। शिक्षक समय का सम्मान करता है तो बच्चा समय की कीमत समझता है। शिक्षक ईमानदार है तो ईमानदारी का संस्कार देता है। शिक्षक दूसरों से सम्मानपूर्वक बात करता है तो बच्चा भी वही सीखता है। इसलिए शिक्षक प्रशिक्षण केवल नई तकनीक और नई शिक्षण पद्धति तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसमें व्यवहार, संवाद, संवेदनशीलता, नैतिकता और भारतीय जीवन-मूल्यों की समझ भी शामिल होनी चाहिए।

यहां परिवार की भूमिका भी कम नहीं है। हम बच्चों से संस्कार की उम्मीद करें और खुद घर में उनके सामने गाली-गलौज, अपमान, झूठ या हिंसा का व्यवहार करें, तो बच्चा आखिर सीखेगा क्या? स्कूल आठ घंटे बच्चे के साथ रह सकता है, लेकिन घर का वातावरण उसके पूरे व्यक्तित्व पर असर डालता है। इसलिए बच्चे को संस्कार देने की जिम्मेदारी केवल शिक्षक पर डालकर माता-पिता अपने दायित्व से बच नहीं सकते।

हमें यह भी समझना होगा कि संस्कार का मतलब बच्चे को सवाल पूछने से रोकना नहीं है। संस्कार का मतलब यह भी नहीं कि वह अन्याय के खिलाफ आवाज न उठाए। संस्कार का अर्थ है कि विरोध करते समय भी मर्यादा बनी रहे, असहमति में भी दूसरे का सम्मान हो और अधिकार मांगते समय कर्तव्य का ध्यान रहे। एक जागरूक और निर्भीक युवा वही है जो गलत के खिलाफ खड़ा हो, लेकिन अपने व्यवहार से खुद गलत उदाहरण न बने।

शिक्षक दिवस पर इसलिए हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि कितने बच्चे प्रथम आए। हमें यह भी पूछना चाहिए कि कितने बच्चे अच्छे नागरिक बन रहे हैं। कितने बच्चों में अपने माता-पिता के प्रति सम्मान है, कितनों में समाज के प्रति जिम्मेदारी है, कितने बच्चे असहमति को स्वीकार करना जानते हैं और कितने बच्चे सोशल मीडिया की भीड़ में अपनी समझ बचाकर रख पा रहे हैं।

भारत को डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और अधिकारी चाहिए, लेकिन उससे पहले उसे अच्छे नागरिक चाहिए। देश का भविष्य केवल उन बच्चों के हाथ में नहीं होगा जिनके अंक सबसे ज्यादा होंगे, बल्कि उन बच्चों के हाथ में होगा जिनमें ज्ञान के साथ विवेक, सफलता के साथ विनम्रता और अधिकार के साथ जिम्मेदारी होगी।

इसलिए आज शिक्षक दिवस पर असली जरूरत शिक्षक सम्मान की परंपरा को केवल समारोह तक सीमित रखने की नहीं, बल्कि शिक्षक की भूमिका को फिर से मजबूत करने की है। शिक्षक को समाज में सम्मान मिले, उसे बेहतर प्रशिक्षण मिले, उसे अपनी जिम्मेदारी निभाने का वातावरण मिले और उससे यह उम्मीद भी की जाए कि वह केवल पाठ नहीं पढ़ाएगा, बल्कि जीवन की समझ भी देगा।

आखिर आने वाली पीढ़ी जैसी होगी, वैसा ही आने वाला भारत होगा। परिवार बच्चे को संस्कार की पहली सीढ़ी देता है और शिक्षक उस संस्कार को दिशा देता है। इसलिए बात केवल शिक्षा बदलने की नहीं है, बात शिक्षा की आत्मा बचाने की है। अगर शिक्षक अपने दायित्व को समझेगा, परिवार अपनी जिम्मेदारी निभाएगा और समाज बच्चों को सही उदाहरण देगा, तो हमारी जेन-जी गुस्से में भी मर्यादा नहीं भूलेगी और आधुनिकता के बीच अपनी जड़ों से भी जुड़ी रहेगी। यही शिक्षक दिवस का सबसे बड़ा संदेश है।