बताओ कहाँ मिलेगें राम…….ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

रे मूरख प्राणी तू राम को कहाँ खोज रहा है ? राम तो तेरे मन के अन्दर हीं बैठे हैं और तू तीर्थ तीर्थ मन्दिर मन्दिर खोजते फिर रहा है। एक बार काम क्रोध मद लोभ मोह त्याग कर प्रेम से अपने मन के अन्दर झाँक कर देख राम तुझे मिल जाएगें। इसी प्रसंग पर प्रस्तुत है मेरी ये रचना :—–

बताओ कहाँ मिलेगें राम ।
अवध कि गलियाँ सरयू के तट ,
घट घट खोजूँ राम ।
बताओ कहाँ मिलेगें………..
तीरथ तीरथ मंदर मंदर ,
घर के बाहर घर के अंदर ,
दर दर खोजूँ राम ।
बताओ कहाँ मिलेगें………..
केवँट के पुरवे में खोजूँ ,
शबरी की कुटिये में खोजूँ ,
बन बन खोजूँ राम ।
बताओ कहाँ मिलेगें………..
खग में खोजूँ मृग में खोजूँ ,
भवँरों की गुंजन में खोजूँ ,
कहीं मिले ना राम ।
बताओ कहाँ मिलेगें…………
खोज खोज कर थाका जब मैं ,
मन के अन्दर झाँका तब मैं ,
मिल गए मेरे राम ।
ये देखो मन मंदिर में राम ।
बताओ कहाँ मिलेगें………..

रचनाकार

 
   ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र