थोड़ा “ज़िंदगी जीने की क्लास” भी ज़रूरी है

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु सिन्हा ‘पुष्पेश ‘  चलिए, सीधी बात करते हैं — हम सबने स्कूल और कॉलेज में खूब पढ़ाई की है। गणित में पसीना…

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अब नहिं शहर सुहात…ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

अब नहिं शहर सुहात —- गावँ छोड़ कर शहर को आया , अब नहिं शहर सुहात । घुटन भरी यह जिन्दगी , कैसे पाउँ निजात…

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कन्यादान…-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

कन्यादान —- वह पिता बड़ा बड़भागी है , जिसने बेटी को जनम दिया । पाला पोषा और बड़ा किया , अपरिमित प्यार दुलार दिया ।…

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आओ प्रिये….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

 आओ प्रिये —- प्यार का मौसम प्रिये, आया बहार लेकर । हैं पल्लवित पुष्पित तरू, यौवन खुमार लेकर । कोयल बुलावत हे प्रिये, कुहु कुहु…

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