जीव ईश्वर की दुनिया से इस दुनिया में आता है और शरीर धारण करता है जिसमें सबसे उत्तम शरीर मनुष्य का होता है। जिस दुनिया…
View More सजनवाँ का लेके जइब नइहरवा………ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रAuthor: admin
भजन चित लाइ करूँ जी प्रभु……….ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
मनुष्य प्रभु को यत्र तत्र खोजते चलता है पर अपने अंतःकरण में झाँक कर नहीं देखता फिर भगवान मिलेगें कैसे ? प्रभु तो मनुष्य के…
View More भजन चित लाइ करूँ जी प्रभु……….ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रकुविचार : गति समय की………………प्रशान्त करण
साधो ! कहा जाता है कि समय गतिशील है . भगवान बुद्ध ने साँसों की यात्रा को जीवन माना , जो निरंतर गतिशील है .…
View More कुविचार : गति समय की………………प्रशान्त करणकरम गति टारे नाहिं टरे ………..ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
कर्म की गति टाले नहीं टल सकती। प्रभु बिरले किसी को मनुष्य शरीर देते हैं पर इस संसार में आकर मनुष्य प्रभु को भूल कर…
View More करम गति टारे नाहिं टरे ………..ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रतेरी लीला अपरम्पार प्रभू………….ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
प्रभु की लीला अपरम्पार है। प्रभु के कुछ अलौकिक लीला का चित्रण मेरी इस रचना के माध्यम से प्रस्तुत है :— तेरी लीला अपरम्पार प्रभू…
View More तेरी लीला अपरम्पार प्रभू………….ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रविश्व हिंदू परिषद् प्रचार प्रसार की एक दिवसीय प्रशिक्षण सम्पन्न
समाज और संस्कृति को बचाने के लिए प्रचार प्रसार की भूमिका अहम – विनोद बंसल रांची:30.06.2024, विश्व हिंदू परिषद् झारखंड प्रांत की एक दिवसीय प्रशिक्षण…
View More विश्व हिंदू परिषद् प्रचार प्रसार की एक दिवसीय प्रशिक्षण सम्पन्नप्रभु राम हमारे घर आए………….ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
अगर मैं कहूँ कि प्रभु राम हमारे घर आए तो इस पर कोई विश्वास नहीं करेगा क्योंकि मैं तो एक अधम नीच प्राणी हूँ मेरे…
View More प्रभु राम हमारे घर आए………….ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रमैं देखूँ जिस ओर प्रभू जी……… ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
प्रस्तुत है शरणागत भजन के रूप में मेरी ये रचना:— मैं देखूँ जिस ओर प्रभू जी , सामने तेरी सूरतिया । मुख पर तेरा नाम…
View More मैं देखूँ जिस ओर प्रभू जी……… ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रसंकट से कौन उबारे….. ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
प्रस्तुत है शरणागत भजन के रूप में मेरी ये रचना:— संकट से कौन उबारे, तुम बिन रघुनन्दन प्यारे । मेरि नाव पड़ी है भवँर में,…
View More संकट से कौन उबारे….. ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रचाटूकारिता …………:प्रशान्त करण
चाटुकारिता एक साधना है। साधे से सधता है।सब से नहीं सधता! अभ्यास से यह सध सकता है। इसके साधक को बहुत कुछ त्याग करना पड़ता…
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